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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

योग विज्ञान के आधार स्तंभ: षट्कर्म, अष्टांग योग और प्राणायाम की संपूर्ण गाइड

 

प्राणायाम: जीवन शक्ति के विस्तार और नियंत्रण का विज्ञान

भारतीय योग विज्ञान में प्राणायाम को प्राण ऊर्जा के विस्तार और नियमन का मुख्य आधार माना गया है। 'प्राणका अर्थ है हमारी जीवन शक्ति और 'आयामका अर्थ है उसे नियंत्रित या विस्तारित करना। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग का यह चतुर्थ अंग केवल श्वास लेने की प्रक्रिया नहींबल्कि शरीरमन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का सेतु है। नियमित प्राणायाम के अभ्यास से न केवल श्वसन तंत्र (Respiratory System) मजबूत होता हैबल्कि यह रक्त के शुद्धिकरणमानसिक तनाव की मुक्ति और एकाग्रता बढ़ाने में भी रामबाण सिद्ध होता है। जब हम अपनी श्वास पर नियंत्रण करना सीख जाते हैंतो हम अपने विचारों और भावनाओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैंजो एक निरोगी और ऊर्जस्वित जीवन की पहली सीढ़ी है।

प्राणायाम केवल 'साँस लेने की प्रक्रियानहीं हैबल्कि यह वह तकनीक है जो आपके शरीर की 'बैटरीको ब्रह्मांडीय ऊर्जा से चार्ज करती है।

आइएइस प्राचीन विज्ञान की गहराई में उतरते हैं।


1. प्राणायाम क्या है? (संजीवनी का विस्तार)

प्राणायाम शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: 'प्राण' (Vital Energy/जीवन शक्ति) और 'आयाम' (Extension/विस्तार)।

महर्षि पतंजलि के अनुसार:

"तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः"

अर्थात्: श्वास और प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोककर उसे एक लय में लाना ही प्राणायाम है।

यह आपके फेफड़ों का व्यायाम मात्र नहीं हैबल्कि आपके सूक्ष्म शरीर की 72,000 नाड़ियों में बहने वाली चेतना का शुद्धिकरण है।


2. प्राणायाम का महत्व और इसे क्यों करें?

क्या आपने कभी गौर किया हैजब आप गुस्से में होते हैंतो आपकी साँसें तेज हो जाती हैं। जब आप शांत होते हैंतो साँसें गहरी और लंबी होती हैं। इसका मतलब है कि आपकी साँसें आपके मन का रिमोट कंट्रोल हैं।

लाभ के क्षेत्र

प्रभाव (Impact)

शारीरिक

रक्त में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ना और कार्बन डाइऑक्साइड का कुशल निष्कासन।

मानसिक

तनाव वाले हार्मोन (Cortisol) में कमी और एकाग्रता में वृद्धि।

भावनात्मक

क्रोधभय और चिंता पर नियंत्रण पाने की अद्भुत क्षमता।

आध्यात्मिक

ध्यान (Meditation) में उतरने के लिए अनिवार्य आधारशिला।


3. आज के परिवेश में इसकी उपादेयता (Why Now?)

आज की भागदौड़ भरी 'डिजिटल लाइफमें प्राणायाम किसी वरदान से कम नहीं है। इसकी प्रासंगिकता के तीन मुख्य कारण हैं:

 👉'फाइट या फ्लाइटमोड से मुक्ति

आज हम हर समय एक अनजाने तनाव में रहते हैं। प्राणायाम हमारे Parasympathetic Nervous System को सक्रिय करता हैजिससे शरीर को संकेत मिलता है कि "सब ठीक हैअब आराम करो।"

 👉प्रदूषण और कमजोर फेफड़े

बढ़ते प्रदूषण और सुस्त जीवनशैली के कारण हम अपनी फेफड़ों की क्षमता का केवल 20-30% ही उपयोग कर पाते हैं। प्राणायाम फेफड़ों के 'डेड स्पेसको कम कर उनकी कार्यक्षमता बढ़ाता है।

👉 डिजिटल डिटॉक्स और एकाग्रता

लगातार स्क्रीन देखने से हमारा 'अटेंशन स्पैनकम हो गया है। भ्रामरी या अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों (Hemispheres) में संतुलन बनाकर मानसिक स्पष्टता लाते हैं।


4.प्राणायाम के बहुआयामी लाभ: एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण

प्राणायाम का अभ्यास केवल श्वास की कसरत नहीं हैबल्कि यह शरीर की संपूर्ण कार्यप्रणाली को पुनर्जीवित करने वाली एक चिकित्सा है। इसके प्रमुख लाभों को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं:

1. शारीरिक लाभ (Physical Benefits)

  • श्वसन तंत्र की मजबूती: प्राणायाम के अभ्यास से फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) बढ़ती है। यह रक्त में ऑक्सीजन के स्तर को सुधारता है और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी अशुद्धियों को बाहर निकालता है।
  • हृदय स्वास्थ्य: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, 'अनुलोम-विलोमऔर 'भ्रामरीजैसे प्राणायाम रक्तचाप (Blood Pressure) को नियंत्रित करने और हृदय गति को सामान्य रखने में सहायक हैं।
  • विषहरण (Detoxification): गहरी और नियंत्रित श्वास के माध्यम से शरीर के 70% विषैले तत्व (Toxins) बाहर निकल जाते हैंजिससे त्वचा में प्राकृतिक चमक आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है।


2. मानसिक और तंत्रिका तंत्र के लाभ (Mental & Neurological Benefits)

  • तनाव और चिंता में कमी: प्राणायाम 'पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम' (Parasympathetic Nervous System) को सक्रिय करता हैजिससे कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम होता है और मन शांत रहता है।
  • एकाग्रता और स्मरण शक्ति: प्राणायाम मस्तिष्क के दोनों हिस्सों (Left and Right Brain) के बीच संतुलन बनाता है। इससे छात्रों और बौद्धिक कार्य करने वालों की फोकस करने की क्षमता बढ़ती है।
  • नींद की गुणवत्ता: 'उज्जायीऔर 'भ्रामरीका नियमित अभ्यास अनिद्रा (Insomnia) की समस्या को जड़ से खत्म करने में कारगर है।


3. आध्यात्मिक और ऊर्जावान लाभ (Spiritual & Energetic Benefits)

  • प्राणिक ऊर्जा का संतुलन: हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ होती हैं। 'नाड़ी शोधनजैसे प्राणायाम इन नाड़ियों के अवरोधों को हटाकर ऊर्जा के प्रवाह को सुचारू करते हैं।
  • इंद्रिय नियंत्रण: पतंजलि योगसूत्र के अनुसार"ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्" अर्थात् प्राणायाम से विवेक के प्रकाश पर पड़ा अज्ञान का पर्दा हट जाता है और साधक का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है।
  • चक्रों की जागृति: निरंतर अभ्यास से मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता हैजिससे साधक उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं का अनुभव कर पाता है।


प्रमाणिकता (Authenticity)

वैज्ञानिक प्रमाण: हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोध बताते हैं कि प्राणायाम 'वेगस नर्व' (Vagus Nerve) को उत्तेजित करता हैजो सीधे हमारे मस्तिष्क के शांति केंद्र से जुड़ी होती है। ग्रंथ प्रमाण: हठयोग प्रदीपिका (2/2) में कहा गया है— "चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्" अर्थात् जब श्वास अस्थिर होती है तो मन भी अस्थिर होता हैऔर श्वास के शांत होने पर मन स्वतः शांत हो जाता है।

बुधवार, 15 जुलाई 2020

योग रहस्य: महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग - यम, नियम से समाधि तक का संपूर्ण ज्ञान


महर्षि पतंजलि योग दर्शन

इस पोस्ट में महर्षि पतंजलि योग दर्शन उसमे वर्णित अष्टांग योग के 8 अंग - यम, नियम, आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा, ध्यान और समाधि का सम्यक विवेचन सरल भाषा में किया गया है। यम, नियम, प्राणायाम, प्रत्याहार और ध्यान के लाभ के बारे में सारगर्भित जानकारी सन्निहित है।  प्रत्येक पाद का  सार  भी उल्लेख किया गया है।  प्रत्याहार,धरना और ध्यान के सूक्षम अंतर को समझाया गया है। यह पोस्ट योग के जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत उपयोगी है।  

योग की पृष्ठभूमि 

    योग भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का अभिन्न अंग है। सृष्टि के आदिकाल से ही यह  है। जीव और ब्रह्म के मि लन को योग की संज्ञा दी गई । आदि योगी भगवान शंकर  ने सप्त ऋषियों  की सहायता से इसका प्रचार - प्रसार कराया। कालांतर में योग की विभिन्न धाराएँ प्रवाहित होने लगीं । गीता में भगवान कृष्ण ने भक्ति योग, ज्ञान योग, सांख्य योग, कर्मयोग आदि योग के प्रकारों का उल्लेख किया है। महर्षि पतंजलि योग दर्शन में अष्टांग योग के 8 अंगों की वैज्ञानिक सूत्र प्रदान किया गया है। 

इसी प्रकार समाज में  विभिन्न  प्रकार के योग विधियों का प्रादुर्भाव हुआ। जैसे - राजयोग, सांख्ययोग , अष्टांग योग, हठयोग, शैवयोग, जैनयोग, बौद्ध योग  सहज योग आदि। इन सभी योग प्रणालियों का एक ही लक्ष्य है - शारीरिक सौष्ठव एवं आध्यात्मिक उन्नति। आत्मसाक्षात्कार , आत्म -  कल्याण के साथ - साथ जन कल्याण,लोक कल्याण। प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करना। 

आज योग की प्रासंगिकता 

आज भौतिकतावादी युग में समस्त मानव जाति भौतिक सुख की चाह में कोल्हू की बैल की भांति साधन जुटाने  अधिक धन कमाने एवं एषणाओं की पूर्ति में  संलिप्त है। उसकी जीवन शैली विकृत हो चुकी है। उसके सोने जागने का समय अनिश्चित हो गया है। खाने का समय निश्चित नहीं रहा । कभी भी, कहीं भी फास्टफूड खाकर पेट भर लेने की आदत से ग्रस्त हो चुका है। आधुनिक संचार साधनों  के माध्यम से परोसी जाने वाली सामग्री  के प्रभाव से  मानसिक शक्ति का ह्रास हो रहा है। अपसंस्कृति के बौछार से आज हमारी संस्कृति का गला घोंटने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है । नैतिकता का दम घुटने लगा है। अश्लीलता और फूहड़पन व्यवहार का अंग बनता जा रहा है। परिणाम स्वरूप आज संपूर्ण मानव समाज का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।  वह विभिन्न प्रकार की बीमारियों  जैसे - डायबिटीज, ब्ल्डप्रेशर,हार्ट संबंधी बीमारी, चिंता, तनाव, अवसाद से ग्रसित होता जा रहा है । वह शक्तिहीन और तेज हीन होता जा रहा है। उसकी आत्मशक्ति का ह्रास हो रहा है। रोगों से  लड़ने की क्षमता में कमी हो रही है। विषम परिस्थितियों से घबराकर वह आत्महत्या  के लिए उद्धत हो रहा है।इसलिए आज फिर से योग को अंगीकार करने का समय  आ गया है । 

    योग ही समाधान है। स्वस्थ रहने का मन्त्र है। योग से शारीरिक, मानसिक  रोगों  से ग्रसित होने से बचा जा सकता है। यह पूर्ण विज्ञान है।  दैनिक जीवन में यदि योग को अङ्गीकार करते हैं तो खान - पान , कुत्सित आचार- विचार , नित्य दूषित कर्म से उत्पन्न रोग से मुक्ति मिल सकती है।  

योग की परिभाषा 

भारतीय संस्कृति में योग को एक पूर्ण विज्ञान माना गया है। विभिन्न ग्रंथों और ऋषियों ने योग के अलग-अलग पहलुओं पर जोर देते हुए इसकी बहुत सुंदर और सारगर्भित परिभाषाएँ दी हैं।

यहाँ प्रमुख ग्रंथों और ऋषियों के अनुसार योग की कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएँ दी गई हैं:

 महर्षि पतंजलि (योगसूत्र)

महर्षि पतंजलि ने योग को मन के अनुशासन के रूप में परिभाषित किया है।

"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥"

  • अर्थ: चित्त (मन) की वृत्तियों (विचारों के उतार-चढ़ाव) को रोकना ही योग है। यानी जब मन पूरी तरह शांत और विचारशून्य हो जाए, वही योग है।

 श्रीमद्भगवद्गीता (भगवान श्रीकृष्ण)

गीता में भगवान कृष्ण ने योग की तीन प्रमुख परिभाषाएँ दी हैं जो कर्म और मानसिक स्थिति पर आधारित हैं:

  • समत्व भाव: "योगस्थः कुरु कर्माणि... समत्वं योग उच्यते॥" (2.48)
    • अर्थ: सिद्धि और असिद्धि (सफलता-विफलता) में समान भाव रखना ही योग है।
  • कर्मों में कुशलता: "योगः कर्मसु कौशलम्॥" (2.50)
    • अर्थ: कर्मों को कुशलतापूर्वक करना (बिना फल की चिंता किए पूरी एकाग्रता से कार्य करना) ही योग है।
  • दुखों से वियोग: "तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्॥" (6.23)
    • अर्थ: दुखों के संयोग से पूरी तरह मुक्त हो जाना ही योग कहलाता है।

 महर्षि याज्ञवल्क्य (याज्ञवल्क्य स्मृति)

महर्षि याज्ञवल्क्य ने आत्मा और परमात्मा के मिलन पर जोर दिया है।

"संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनोः॥"

  • अर्थ: जीवात्मा और परमात्मा का एक हो जाना ही योग कहलाता है। यह योग की सबसे प्रचलित आध्यात्मिक परिभाषा है।

 योग वशिष्ठ (महर्षि वशिष्ठ)

भगवान राम के गुरु महर्षि वशिष्ठ ने मन की शांति को योग माना है।

"संसारतरणे युक्तिः योगशब्देन कथ्यते॥"

  • अर्थ: संसार रूपी सागर से पार उतरने की युक्ति (तरीका) ही योग है।

"मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते॥"

  • अर्थ: मन को शांत करने का जो उपाय है, उसे ही योग कहा जाता है।

 स्वामी विवेकानंद

आधुनिक काल के महान योगी स्वामी विवेकानंद ने योग को आत्म-साक्षात्कार का साधन बताया है।

  • परिभाषा: प्रत्येक आत्मा अव्यक्त ब्रह्म है। बाह्य और अंतः प्रकृति को वश में करके अपने भीतर की इस दिव्यता को प्रकट करना ही योग है।

 कठोपनिषद

उपनिषदों में इंद्रियों के नियंत्रण को योग माना गया है।

  • परिभाषा: जब पाँचों इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा (चंचलता) नहीं करती, उस परम स्थिर अवस्था को योग कहते हैं।

 श्री अरबिंदो

महर्षि अरबिंदो के अनुसार योग केवल मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि जीवन के पूर्ण रूपांतरण के लिए है।

  • परिभाषा: योग 'सम्पूर्ण जीवन का योग' है। यह मानव चेतना को दिव्य चेतना में बदलने की एक विधि है।

निष्कर्ष (सारांश)

इन सभी परिभाषाओं को देखने पर हम कह सकते हैं कि योग के तीन मुख्य स्तर हैं:

  1. शारीरिक और मानसिक स्तर: चित्त की शुद्धि और एकाग्रता।
  2. व्यावहारिक स्तर: कार्यों में कुशलता और सुख-दुख में समानता।
  3. आध्यात्मिक स्तर: स्वयं को जानना और परमात्मा में लीन होना।

महर्षि पतंजलि योग दर्शन  एवं अष्टांग योग  

    महर्षि पतंजलि ने सर्वप्रथम योग को वैज्ञानिक  कलेवर प्रदान किया। एक व्यवस्थित स्वरूप दिया, मानव समाज के लिए पतंजलि योगदर्शन जैसा उत्कृष्ट ग्रंथ का प्रणयन किया।जो युगों- युगों तक योग की गंगा  की पावन धारा से मानव को तारती रहेगी। व्यक्ति और समाज को निर्मल बनाती रहेगी।  
    महर्षि पतंजलि ने इस दर्शन में अष्टांगयोग के सूत्रों का विवेचन किया है। इस दर्शन के चार भाग हैं-
1.समाधिपाद 
2.साधनपाद  
3.विभूतिपाद 
4.कैवल्यपाद 

1.समाधिपाद

समाधिपाद में योग के मूल अर्थ, चित्त की वृत्तियों को नियमन करने के उपाय ,समाधि के प्रकार, ईश्वर का स्वरूप और योग साधना में आने वाली बाधाओं को दूर करने का वर्णन किया गया है।  इस भाग केंद्रीय तत्व या उद्देश्य चित्त की चंचलता को नियंत्रित करना है।  इस पाद में 51 सूत्र हैं। यह अध्याय 
"अथ योगानुशासनम्‌"  से प्रारंभ होकर  "तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः" पर पूर्ण होता है।

2. साधनपाद 

साधन पाद का मूल विषय

साधन पाद का मुख्य उद्देश्य योग की व्यावहारिक पद्धति को समझाना है। जहाँ 'समाधि पाद' (प्रथम अध्याय) उच्च स्तर के साधकों के लिए है, वहीं 'साधन पाद' साधारण मनुष्यों के लिए योग की सीढ़ी तैयार करता है।साधन पाद हमें सिखाता है कि किस प्रकार बाहरी अनुशासन (यम-नियम,आसन, प्राणायाम ) से शुरू करके हम आतंरिक अनुशासन ( प्रत्याहार,धारणा,ध्यान )  की ओर बढ़ सकते हैं।

इसके मुख्य विषय निम्नलिखित हैं:

  • क्रिया योग: तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।
  • क्लेशों का वर्णन: वे पाँच कारण जो दुखों का मूल हैं (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश)।
  • दुख का दर्शन: दुख का कारण (द्रष्टा और दृश्य का संयोग) और उससे मुक्ति का मार्ग।
  • अष्टांग योग: योग के आठ अंगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि) की नींव यहीं रखी गई है।

 सूत्रों की संख्या

साधन पाद में कुल 55 सूत्र हैं।

महत्वपूर्ण सूत्र

साधन पाद के कुछ अत्यंत प्रभावशाली सूत्र नीचे दिए गए हैं:

 क्रिया योग (सूत्र 1)

"तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥"

  • अर्थ: तप, स्वाध्याय (स्वयं का अध्ययन/शास्त्रों का पाठ) और ईश्वर प्रणिधान (ईश्वर के प्रति समर्पण) ही क्रिया योग है।

 पंच क्लेश (सूत्र 3)

"अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥"

  • अर्थ: अविद्या (अज्ञान), अस्मिता (अहंकार), राग (शक्तिशाली आसक्ति), द्वेष (घृणा) और अभिनिवेश (मृत्यु का भय)—ये पाँच क्लेश हैं।

विवेक ख्याति (सूत्र 25)

"तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशेः कैवल्यम्॥"

  • अर्थ: अविद्या के अभाव से (द्रष्टा और दृश्य के) संयोग का अभाव हो जाता है, यही 'हान' (मुक्ति) है और यही द्रष्टा की कैवल्य अवस्था है।

 अष्टांग योग की शुरुआत (सूत्र 28-29)

"योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः॥"

  • अर्थ: योग के अंगों के अनुष्ठान से अशुद्धि का नाश होने पर ज्ञान का प्रकाश विवेक ख्याति (परम ज्ञान) तक विस्तृत हो जाता है।

"यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥"

  • अर्थ: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये योग के आठ अंग हैं।

 अहिंसा की सिद्धि (सूत्र 35)

"अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः॥"

  • अर्थ: जब साधक अहिंसा में पूरी तरह प्रतिष्ठित हो जाता है, तो उसके निकट आने वाले सभी प्राणी अपने वैर (शत्रुता) का त्याग कर देते हैं।

        1. यम (सामाजिक अनुशासन)

    यम का अर्थ है वे नियम जो हमें समाज में दूसरों के साथ व्यवहार करना सिखाते हैं। ये पाँच हैं:

  • अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न पहुँचाना।
  • सत्य: विचारों और वाणी में सच्चाई रखना।आत्मानुभूति के बिना एक भी शब्द न बोलना।  देखना, सुनना और उसे परखना फिर आचरण में लाना। गूढ़ अर्थों में सत्य ईश्चर है, शेष मिथ्या है।
  • अस्तेय: चोरी न करना (दूसरे की वस्तु को पाने की इच्छा न करना)।
  • ब्रह्मचर्य: अपनी इंद्रियों और ऊर्जा का संयम करना।इसे दो अर्थों में लिया जाता है । पहला सदा ब्रह्म में लीन रहना। सब में ब्रह्म की अनुभूति करना। दूसरा सप्रयास वीर्यादि का संरक्षण करना।
  • अपरिग्रह: आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना।

     2. नियम (स्वयं पर या व्यक्तिगत अनुशासन)

  • ये नियम स्वयं की शुद्धि और उन्नति के लिए हैं। ये भी पाँच हैं:

    नियम अपने लिए हैं। इससे व्यक्ति स्वयं परिमार्जित होता है।
  • शौच: शरीर और मन की स्वच्छता।वचन और कर्म से पवित्र होना
  • संतोष: जो प्राप्त है उसमें प्रसन्न रहना।उद्यम से, पुरुषार्थ करने से, कर्म करने से जो कुछ प्राप्त हुआ  वहीं अपना है, उसी में संतोष करना।
  • तप: सुख-दुख को समान मानकर अनुशासित जीवन जीना। कर्मशील रहना, विषम परिस्थितियों में भी अपने धैर्य और साहस को न त्यागना। शारीरिक, मानसिक कष्ट से विचलित न होना।
  • स्वाध्याय: स्वयं का आत्म-चिंतन और पवित्र ग्रंथों का अध्ययन करना।दो अर्थों में प्रयुक्त हआ है । पहला स्व का अध्ययन अर्थात आत्मनिरीक्षण । दूसरा सु- अध्ययन अर्थात सत साहित्यों का अनुशीलन करना । इन दोनों से व्यक्ति के चरित्र में निखार आता है। 
  • ईश्वर प्रणिधान: ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण।ईश्चर प्राणिधान का गूढ़ अर्थ है - पुरुषार्थ से, परिश्रम से, कर्म करने से जो कुछ प्राप्त हुआ है सबकुछ ईश्चर को समर्पित कर देना। कर्ता के भाव से मुक्त होना। कर्म के अभिमान से मुक्त होना। अर्थात ईश्चर  के प्रति कृतज्ञता का भाव ही ईश्चर प्राणिधान है। ये दोनों (यम और नियम) योग की प्रारंभिक दो अनिवार्य सीढ़ियां है।  जो साधक इन सीढ़ियों से होकर गुजरता है, वह खरा होता है , समाज के लिए  उपयुक्त होता है। वह पथभ्रष्ट नहीं होता। साधना को कलंकित नहीं करता।

      3. आसन (स्थिरता)

  • पतंजलि के अनुसार, "स्थिरसुखमासनम्"। अर्थात्, जिस स्थिति में शरीर स्थिर रहे और सुख का अनुभव हो, वही आसन है। यह ध्यान के लिए शरीर को तैयार करता है।आसन  से साधना के लिए  शरीर और मन दोनों को साधा जाता है। साधना के लिए लंबे समय तक शरीर को एक स्थिति में रखना होता है।  आसनों के नित्य अभ्यास से शरीर सुंदर और सुडौल एवं निरोग बनाया जा सकता है। इसकी सहायता से शारीरिक दोषों को दूर किया जा सकता है। निश्चित ही यही कारण है कि कुछ लोग आसन और कुछ व्यायाम को योग समझ बैठे हैं।

    4. प्राणायाम (श्वास नियंत्रण) 

    प्राण (श्वास) की गति को नियंत्रित और संतुलित करना। प्राणों का नियमन ही प्राणायाम है।  प्राणायाम से मन की चंचलता कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है।प्राणायाम  शब्द प्राण और आयाम से मिलकर बना है।  यहां पर सामान्य अर्थमें  प्राण  से आशय श्वास -  प्रश्वास से है। और आयाम से आशय दिशा देना। लय  प्रदान करने से है।  वास्तव में प्राण वह सूक्ष्म तत्व है जो  श्वासों के माध्यम से शरीर में फैलता है और शरीर को चेतनशील बनाए रखता है।  प्राणायाम की सहायता से इस तत्व को शरीर में संतुलित किया जाता है। इसके संतुलन से शरीर में ऊर्जा और स्फूर्ति का संचार होता है। शरीर और मन के दोषों का शमन होता है।  मन की एकाग्रता का विकास होता है। जो योग साधना के लिए अनिवार्य  है। यह एकाग्रता  जीवन के सभी क्रियाकलाप को निष्पन्न करने के लिए भी परमावश्यक है। प्राणायाम प्राणोंत्थान  का सहज माध्यम है किन्तु पूर्ण योग नहीं ।

    5. प्रत्याहार (इंद्रिय निग्रह)

    अपनी इंद्रियों (आंख, कान, नाक आदि) को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना। यह बाहरी दुनिया और आंतरिक दुनिया के बीच का सेतु (पुल) है।इसका अर्थ है इन्द्रियों को उनके विषयो से हटाना । हमारे शरीर में स्थित पांच ज्ञानेंद्रियां है। प्रत्येक ज्ञानेंद्री का एक विषय है। जैसे - आंख का विषय है सुंदर वस्तुओं में रमण करना। कान का विषय है - मधर और प्रिय सुनना। जीभ (रसना) का विषय है - सुमधुर वस्तुओं का रसास्वादन करना। नाक का विषय है - सुगंध । त्वचा का विषय है -  स्नेह और प्यार से भरा कोमल स्पर्श ।

    प्रत्याहार से साधक अपने आसपास की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। वह सभी परिस्थितियों में समान रहता है। उसे सुख में  न हर्ष की अनुभूति होती और दुख में  न विषाद की। जय - पराजय, लाभ - हानि  से वह विचलित नहीं होता। सदैव एक सा व्यवहार करता है।

    अंतरंग योग

    6. धारणा (एकाग्रता)

    चित्त या मन को किसी एक वस्तु, विचार या केंद्र बिंदु पर टिकाने का प्रयास करना 'धारणा' कहलाता है।धारणा का सामान्य अर्थ है, कोई छवि, रूप, बिम्ब, आकृति, विचार, शोच आदि। यहां पर धारणा से तात्पर्य वह केन्द्र है जिसमें साधक अपने मन को लगाता है। कुछ क्षणों के लिए रुकता है। आइए इसे और समझते हैं। हमारे मन में नाना विचार चलते रहते हैं। एक विचार पूर्ण नहीं होता कि दूसरा विचार उत्पन्न हो जाता है और वह पहले विचार का स्थान ग्रहण कर लेता है। यह क्रम निरंतर चलता रहता है। प्रति पल विचार का केन्द्रीय विषय बदलता रहता है। हमारे मानस पटल पर विचार से संबंधित छवियां बनती और बिगड़ती रहती है। उनके बीच कोई सामंजस्य नहीं होता।किन्तु जब विचार केन्द्रीय भूत हो जाता है। निर्धारित केन्द्र बिंदु के इर्द - गिर्द ही विचार एक ही दिशा में स्वाभाविक गति करने लगे , वहीं धारणा है। साधक ध्येय को चुनने के लिए स्वतंत्र होता हैं। ध्येय के प्रति साधक की यथार्थ संकल्पना ही धारणा है।

    7. ध्यान (निरंतरता)

    जब धारणा की अवस्था गहरी हो जाती है और मन बिना किसी रुकावट के लगातार एकाग्र रहता है, तो उसे 'ध्यान' कहते हैं।धारणा की प्रगाढ़ता का नाम ही  ध्यान है।  ध्येय में निमग्नता की स्थिति ध्यान है।  इसमें साधक विचार शून्य होने लगता है।  उसकी वाह्य चेतना कम होती जाती है।  वह वाह्य क्रियाओं के प्रति प्रतिक्रिया नहीं करता। निरंतर ध्येय से जुड़ा रहता है।  योग परंपरा में अनेक ध्यान की विधियों की चर्चा है उनमें से  है -भावातीत ध्यान। कुण्डलिनी ध्यान। 

    8. समाधि (परमानंद)

    यह योग की अंतिम अवस्था है। यहाँ साधक अपने स्वरूप को भूलकर केवल 'ध्येय' (जिसका ध्यान किया जा रहा है) में लीन हो जाता है। यहाँ स्वयं का अस्तित्व समाप्त होकर परमात्मा से मिलन होता है।समाधि ध्यान की प्रगाढ़ता. विचारशून्यता  की स्थिति है।  इसमें साधक वाह्य संवेदनाओं से मुक्त हो जाता है। ध्येय भी विलीन हो जाता है।  साधक पूरी तरह से स्थिर हो जाता है।  समाधि मुख्यतः दो प्रकार की बताई गई है - सबीज समाधि एवं निर्बीज समाधि।

     पहले पाँच अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार) शरीर और इंद्रियों को साधते हैं, जबकि अंतिम तीन (धारणा, ध्यान, समाधि) सीधे मन और आत्मा पर कार्य करते हैं।

    महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में केवल योग के अंगों का वर्णन ही नहीं किया, बल्कि यह भी बताया है कि इनका पालन करने से साधक को जीवन में क्या सिद्धियाँ और लाभ प्राप्त होते हैं।

    यहाँ यम और नियम के पालन से होने वाले लाभों का विस्तार से वर्णन है:

    1. यम के पालन से होने वाले लाभ (Social Benefits)

    • अहिंसा (Non-violence): जब साधक पूरी तरह अहिंसक हो जाता है, तो उसके आसपास के लोग और पशु-पक्षी भी अपना वैर-भाव (दुश्मनी) त्याग देते हैं। वातावरण में शांति छा जाती है।
    • सत्य (Truthfulness): सत्य की सिद्धि होने पर साधक की वाणी में शक्ति आ जाती है। वह जो कहता है, वह सच हो जाता है (वाक्-सिद्धि)।
    • अस्तेय (Non-stealing): जब साधक चोरी का भाव त्याग देता है और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा नहीं करता, तब उसे अनमोल रत्नों और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है (मानसिक संतुष्टि के रूप में)।
    • ब्रह्मचर्य (Continence): ब्रह्मचर्य का पालन करने से शारीरिक और मानसिक शक्ति (वीर्य लाभ) प्राप्त होती है। साधक का मनोबल और आत्मविश्वास बहुत बढ़ जाता है।
    • अपरिग्रह (Non-possessiveness): जब व्यक्ति अनावश्यक वस्तुओं का मोह छोड़ देता है, तो उसे अपने पूर्व जन्मों और जीवन के गहरे रहस्यों का ज्ञान होने लगता है।

    2. नियम के पालन से होने वाले लाभ (Personal Benefits)

    • शौच (Purity):  बाहरी शुद्धि: अपने शरीर के प्रति मोह कम होता है।आंतरिक शुद्धि: मन प्रसन्न रहता है, एकाग्रता बढ़ती है और इंद्रियों पर विजय प्राप्त होती है।
    • संतोष (Contentment): संतोष से मनुष्य को "अनुपम सुख" की प्राप्ति होती है। यह दुनिया के किसी भी धन-दौलत से बड़ा सुख है।
    • तप (Austerity): तपस्या (जैसे उपवास या कठिन अनुशासन) करने से शरीर की अशुद्धियाँ नष्ट हो जाती हैं और शरीर व इंद्रियाँ शक्तिशाली (सिद्ध) हो जाती हैं।
    • स्वाध्याय (Self-study): पवित्र ग्रंथों के अध्ययन और आत्म-चिंतन से साधक का अपने इष्ट देव या उच्च शक्तियों से संपर्क स्थापित होता है।
    • ईश्वर प्रणिधान (Surrender to God): ईश्वर को सब कुछ समर्पित कर देने से 'समाधि' की सिद्धि बहुत शीघ्र हो जाती है।

    3. आसन ,प्राणायाम और प्रत्याहार के लाभ

    • आसन: आसन सिद्ध होने पर शरीर पर सर्दी-गर्मी, सुख-दुख जैसे "द्वंद्वों" का प्रभाव पड़ना बंद हो जाता है।
    • प्राणायाम: इससे बुद्धि पर पड़ा हुआ अज्ञान का पर्दा हट जाता है और मन धारणा (एकाग्रता) के लिए तैयार हो जाता है।
    • प्रत्याहार: इंद्रियाँ पूरी तरह वश में हो जाती हैं, जिससे साधक का अपनी इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण हो जाता है।

महत्वपूर्ण बात:

  • अष्टांग योग का अभ्यास करने से न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) भी बेहतर होता है और व्यक्ति का व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है।

3.विभूति पाद: योग की सिद्धियाँ और उपलब्धियाँ

विभूति पाद योगसूत्र का तीसरा अध्याय है, जिसमें कुल 55 सूत्र हैं। इसका मुख्य विषय 'संयम' और उससे प्राप्त होने वाली अलौकिक शक्तियाँ (सिद्धियाँ) हैं।

मुख्य तथ्य:

  • संयम की परिभाषा: धारणा, ध्यान और समाधि—जब ये तीनों एक ही विषय पर केंद्रित होते हैं, तो उसे 'संयम' कहा जाता है।
  • सिद्धियाँ (विभूतियाँ): संयम के माध्यम से साधक को विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे भूतों और भविष्य का ज्ञान, पशु-पक्षियों की भाषा समझना, अदृश्य होना और आकाश गमन।
  • सावधानी: पतंजलि स्पष्ट करते हैं कि ये सिद्धियाँ समाधि के मार्ग में बाधा हैं, इसलिए साधक को इनमें फँसने के बजाय इनसे ऊपर उठना चाहिए।

महत्वपूर्ण सूत्र:

"त्रयमेकत्र संयमः॥" (3.4)

  • अर्थ: धारणा, ध्यान और समाधि, इन तीनों का एक साथ होना 'संयम' कहलाता है।

"तज्जयात् प्रज्ञालोकः॥" (3.5)

  • अर्थ: संयम पर विजय प्राप्त करने से प्रज्ञा (परम बुद्धि) का प्रकाश आलोकित होता है।

"ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥" (3.37)

  • अर्थ: ये सिद्धियाँ समाधि के मार्ग में बाधा (उपसर्ग) हैं, यद्यपि सांसारिक दृष्टि से ये महान उपलब्धियाँ लगती हैं।

4. कैवल्य पाद: मुक्ति का सर्वोच्च शिखर

कैवल्य पाद योगसूत्र का चौथा और अंतिम अध्याय है, जिसमें 34 सूत्र हैं। यह अध्याय दार्शनिक है और 'कैवल्य' (पूर्ण स्वतंत्रता या मोक्ष) की अवस्था का वर्णन करता है।

मुख्य तथ्य:

  • सिद्धियों के स्रोत: सिद्धियाँ पाँच प्रकार से प्राप्त हो सकती हैं—जन्म से, औषधि से, मंत्र से, तप से और समाधि से।
  • चित्त का स्वरूप: चित्त स्वयं प्रकाशवान नहीं है, वह दृष्टा (पुरुष/आत्मा) के प्रकाश से प्रकाशित होता है।
  • धर्ममेघ समाधि: जब साधक सर्वोच्च ज्ञान प्राप्त कर लेता है और सिद्धियों के प्रति भी वैराग्य भाव रखता है, तब उसे 'धर्ममेघ समाधि' प्राप्त होती है।
  • कैवल्य: जब गुणों (सत्व, रज, तम) का अधिकार समाप्त हो जाता है और पुरुष (आत्मा) अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है, उसे ही कैवल्य कहते हैं।

महत्वपूर्ण सूत्र:

"जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाः सिद्धयः॥" (4.1)

  • अर्थ: सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि से प्राप्त होती हैं।

"ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥" (4.30)

  • अर्थ: धर्ममेघ समाधि प्राप्त होने पर सभी क्लेशों और कर्मों से निवृत्ति (मुक्ति) मिल जाती है।

"पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥" (4.34)

  • अर्थ: गुणों का अपने मूल कारण (प्रकृति) में विलीन हो जाना और चेतन शक्ति (आत्मा) का अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना ही कैवल्य है।

कैवल्यपाद  का सार 

जहाँ विभूति पाद हमें यह बताता है कि मन की एकाग्रता से मनुष्य प्रकृति की शक्तियों पर विजय पा सकता है, वहीं कैवल्य पाद हमें यह चेतावनी देता है कि शक्तियों का संचय योग का अंतिम लक्ष्य नहीं है। योग का वास्तविक उद्देश्य आत्मा को प्रकृति के बंधनों और गुणों से मुक्त कर उसे उसके शुद्ध, आनंदमयी और शाश्वत स्वरूप में स्थापित करना है।

अब  आप के मन में यह विचार उठ रहा होगा कि  इन सिद्धियों के प्रति वैराग्य कैसे उत्पन्न किया जाता है? आइए जानते हैं इसके सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि  ने क्या उपाय बताया है। 

सिद्धियों के प्रति वैराग्य (Detachment) उत्पन्न करना 

सिद्धियों के प्रति वैराग्य (Detachment) उत्पन्न करना योग मार्ग की सबसे कठिन लेकिन आवश्यक चुनौतियों में से एक है। महर्षि पतंजलि ने बताया है कि जब साधक अपनी साधना से अलौकिक शक्तियाँ (विभूतियाँ) प्राप्त करता है, तो अहंकार के जागृत होने और मार्ग से भटकने का खतरा बढ़ जाता है।

सिद्धियों के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने के लिए निम्नलिखित सूत्रों और सिद्धांतों को समझना आवश्यक है:

1. सिद्धियों को 'बाधा' समझना (सूत्र 3.37)

महर्षि पतंजलि ने स्पष्ट चेतावनी दी है:

"ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥"

  • अर्थ: जो शक्तियाँ संसार की दृष्टि में 'सिद्धियाँ' (उपलब्धियाँ) हैं, वे समाधि के मार्ग में 'उपसर्ग' (बाधाएँ) हैं।
  • वैराग्य का तरीका: साधक को निरंतर यह विचार करना चाहिए कि सिद्धियाँ केवल चित्त का विस्तार हैं, आत्मा का लक्ष्य नहीं। जिस प्रकार एक यात्री अपनी मंजिल की ओर जाते समय रास्ते के सुंदर दृश्यों में रुककर अपनी यात्रा भूल सकता है, वैसे ही सिद्धियाँ साधक को मुख्य लक्ष्य (कैवल्य) से भटका देती हैं।

2. 'पर वैराग्य' का अभ्यास (सर्वोच्च वैराग्य)

वैराग्य के दो स्तर होते हैं। सिद्धियों से छूटने के लिए 'पर वैराग्य' की आवश्यकता होती है:

  • अपर वैराग्य: संसार की वस्तुओं से मोह हटाना।
  • पर वैराग्य: जब प्रकृति के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) और उनसे प्राप्त होने वाली शक्तियों से भी तृष्णा समाप्त हो जाए। यह ज्ञान होने पर आता है कि सिद्धियाँ भी अनित्य (temporary) हैं और प्रकृति के दायरे में ही आती हैं।

3. विवेक ख्याति (तत्व ज्ञान)

जब साधक को 'पुरुष' (आत्मा) और 'प्रकृति' के बीच का अंतर स्पष्ट दिखने लगता है, तो उसे विवेक ख्याति कहते हैं।

  • जब साधक यह जान लेता है कि वह स्वयं 'आत्मा' है और सिद्धियाँ 'प्रकृति' का खेल हैं, तो उसका आकर्षण स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

4. दोष दर्शन (सिद्धियों के दोष देखना)

वैराग्य उत्पन्न करने का एक व्यावहारिक तरीका उनके दोषों को देखना है:

  • सिद्धियाँ आने पर अहंकार (Ego) बढ़ता है।
  • अहंकार बढ़ने से साधक का पतन होता है और वह जन्म-मृत्यु के चक्र में फिर से फँस जाता है।
  • सिद्धियाँ भी अंततः क्षीण हो जाती हैं, जबकि कैवल्य (मुक्ति) शाश्वत है।

5. धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति (सूत्र 4.29)

"प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः॥"

  • अर्थ: जब साधक को सर्वोच्च सिद्धियों (सर्वज्ञता) में भी कोई रुचि नहीं रहती और वह उनसे भी वैराग्य कर लेता है, तब उसे 'धर्ममेघ समाधि' प्राप्त होती है।
  • यह वैराग्य की वह पराकाष्ठा है जहाँ साधक को कुछ भी पाने की इच्छा नहीं रहती।

वैराग्य के लिए व्यावहारिक सुझाव:

  1. साक्षी भाव: सिद्धियों को अपना चमत्कार न मानकर केवल प्रकृति की एक घटना के रूप में देखें।
  2. ईश्वर प्रणिधान: सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दें। जब साधक मानता है कि "जो कुछ है वह ईश्वर का है", तो अहंकार नहीं आता।
  3. सत्संग और स्वाध्याय: महापुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करें जिन्होंने सिद्धियों को ठोकर मारकर ईश्वर को चुना।

निष्कर्ष:

सिद्धियों के प्रति वैराग्य ही वह द्वार है जिससे होकर 'कैवल्य' (परम मुक्ति) प्राप्त होती है। यदि साधक सिद्धियों में अटक जाए, तो वह एक 'सिद्ध' पुरुष तो बन सकता है, लेकिन 'मुक्त' पुरुष नहीं।

निश्चित रूप से इतना पढ़ने के बाद आप यह जानना चाहेंगे कि कैवल्य प्राप्त करने के बाद एक मुक्त पुरुष का जीवन कैसा होता है ?

मुक्त पुरुष का जीवन

योग दर्शन के अनुसार, 'कैवल्य' वह परम अवस्था है जहाँ पुरुष (आत्मा) प्रकृति के बंधनों और तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से पूरी तरह मुक्त हो जाता है। जब कोई साधक जीवित रहते हुए इस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, तो उसे 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है।

कैवल्य प्राप्त मुक्त पुरुष का जीवन निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त होता है:

1. गुणों के अधिकार की समाप्ति (गुणातीत)

साधारण मनुष्य प्रकृति के तीन गुणों (सत रज तम) सुख, दुख और मोह के अधीन कार्य करता है, लेकिन मुक्त पुरुष इन गुणों से ऊपर उठ जाता है।

  • उसके चित्त में अब कोई संस्कार नया बीज नहीं बनाता।
  • उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना—सब समान हो जाते हैं।

2. क्लेशों और कर्मों का पूर्ण अभाव

कैवल्य प्राप्त होने पर पाँचों क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश) जड़ से समाप्त हो जाते हैं।

  • निष्काम कर्म: मुक्त पुरुष के कर्म अब 'शुक्ल' (सफ़ेद/पुण्य) या 'कृष्ण' (काले/पाप) नहीं होते। उसके कर्म फल की इच्छा से रहित होते हैं, इसलिए वे नए जन्म का कारण नहीं बनते।

3. स्वरूप-प्रतिष्ठा (आत्मा में स्थिति)

पतंजलि कहते हैं— "तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्"

  • साधारण अवस्था में हमारी पहचान हमारे विचारों और शरीर से होती है, लेकिन मुक्त पुरुष निरंतर अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप में स्थित रहता है। वह शरीर में रहते हुए भी स्वयं को शरीर से अलग अनुभव करता है।

4. अखंड शांति और आनंद

मुक्त पुरुष का सुख बाहरी विषयों (जैसे भोजन, संपत्ति या प्रशंसा) पर निर्भर नहीं होता।

  • वह 'आत्माराम' हो जाता है, अर्थात उसे स्वयं की आत्मा में ही परम संतोष और आनंद मिलता है।
  • संसार की कोई भी प्रतिकूल परिस्थिति (बीमारी, अपमान या मृत्यु का भय,लाभ-हानि ) उसकी आंतरिक शांति को भंग नहीं कर सकती।

5. धर्ममेघ समाधि का प्रभाव

कैवल्य की दहलीज पर खड़ा मुक्त पुरुष 'धर्ममेघ समाधि' में रहता है।

  • इसका अर्थ है कि उस पर ज्ञान की ऐसी वर्षा होती रहती है जिससे अज्ञान का अंधकार पूरी तरह मिट जाता है।
  • उसकी बुद्धि 'ऋतम्भरा प्रज्ञा' (केवल सत्य को ग्रहण करने वाली बुद्धि) से युक्त हो जाती है।

6. लोक-कल्याण की भावना

यद्यपि मुक्त पुरुष का अपना कोई व्यक्तिगत स्वार्थ या कर्तव्य शेष नहीं रहता, फिर भी वह संसार में रहते हुए केवल लोक-कल्याण के लिए कार्य करता है।

  • उसके द्वारा किए गए कार्य समाज के लिए आदर्श बन जाते हैं।
  • उसकी उपस्थिति मात्र से ही दूसरों को शांति और प्रेरणा मिलती है।

7. विदेह कैवल्य (मृत्यु के पश्चात)

जब मुक्त पुरुष का प्रारब्ध कर्म (वर्तमान शरीर का समय) समाप्त हो जाता है, तब वह शरीर का त्याग कर देता है। इसे 'विदेह कैवल्य' कहते हैं।

  • इसके बाद उसका पुनर्जन्म नहीं होता।
  • वह प्रकृति के चक्र से मुक्त होकर अपने शुद्ध, अनंत और अविनाशी स्वरूप में सदा के लिए विलीन हो जाता है।

सारांश

एक मुक्त पुरुष का जीवन "जल में कमल के पत्ते" के समान होता है। जिस प्रकार कमल पानी में रहकर भी उससे भीगता नहीं, वैसे ही मुक्त पुरुष संसार के सभी कार्यों को करते हुए भी उनके बंधनों और दुखों से अछूता रहता है।

अब आपके मस्तिष्क में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि  महर्षि पतंजलि ने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए अभ्यास और वैराग्य को इतना महत्वपूर्ण क्यों बताया है?

आइए समझते है 

अभ्यास और वैराग्य का महत्त्व 

महर्षि पतंजलि ने योग के पहले ही अध्याय के दूसरे सूत्र (योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः) में योग की परिभाषा दी है, लेकिन उसके बाद बारहवें सूत्र में (अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः) और आगे के तीन सूत्रों (13,14,15)  (तत्र स्थितौ यत्नोभ्यासः) में   उन्होंने 'अभ्यास' और 'वैराग्य' को योग का आधार स्तंभ बताया है।

सूत्र है: "अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥" (1.12)

अर्थात्: अभ्यास और वैराग्य के माध्यम से ही चित्त की वृत्तियों (विचारों के उतार-चढ़ाव) को रोका जा सकता है।

कैवल्य जैसी सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचने के लिए ये दोनों क्यों अनिवार्य हैं, आइए विस्तार से समझते हैं:

1. अभ्यास (Practice): मन को दिशा देना

अभ्यास का अर्थ केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि मन को एक ही लक्ष्य (आत्मा) पर बार-बार टिकाने का प्रयास है।

  • स्थिरता के लिए: हमारा मन जन्मों-जन्मों के संस्कारों के कारण चंचल है। इसे शांत करने के लिए निरंतर प्रयास की आवश्यकता है।
  • दृढ़ता का सूत्र: पतंजलि कहते हैं कि अभ्यास तभी सफल होता है जब वह:
    1. दीर्घकाल: लंबे समय तक किया जाए।
    2. निरंतर: बिना किसी नागा (gap) के हर रोज किया जाए।
    3. सत्कारपूर्वक: पूरी श्रद्धा, प्रेम और उत्साह के साथ किया जाए।
  • लाभ: सही अभ्यास से पुरानी गलत आदतें (संस्कार) मिटने लगती हैं और मन वश में होने लगता है।

2. वैराग्य (Detachment): भटकाव को रोकना

यदि अभ्यास एक हाथ से मन को पकड़ने जैसा है, तो वैराग्य दूसरे हाथ से उन चीजों को छोड़ने जैसा है जो हमें भटकाती हैं।

  • आकर्षण से मुक्ति: संसार की वस्तुएं, पद, प्रतिष्ठा और सुख हमें अपनी ओर खींचते हैं। जब तक मन इनमें अटका रहेगा, वह समाधि में नहीं लग सकता।
  • विवेक की शक्ति: वैराग्य का अर्थ संसार छोड़कर भागना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि संसार की चीजें अनित्य (temporary) हैं और असली सुख भीतर है।
  • पर वैराग्य: जैसा हमने पहले चर्चा की, जब साधक को प्रकृति के गुणों से भी कोई मोह नहीं रहता, तब वह कैवल्य के योग्य बनता है।

अभ्यास और वैराग्य का संतुलन क्यों जरूरी है?

इसे एक नाव के उदाहरण से समझा जा सकता है:

  1. अभ्यास पतवार (Oar) की तरह है: जो नाव को आगे बढ़ाता है। यदि आप अभ्यास नहीं करेंगे, तो नाव एक ही जगह खड़ी रहेगी।
  2. वैराग्य लंगर (Anchor) को उठाने जैसा है: यदि आपकी नाव संसार के मोह-माया के लंगर से बंधी है, तो आप कितनी भी पतवार (अभ्यास) चला लें, नाव आगे नहीं बढ़ेगी।
  • केवल अभ्यास: यदि वैराग्य नहीं है, तो साधक योग से शक्तियाँ (सिद्धियाँ) तो पा लेगा, लेकिन अहंकार और वासना के कारण फिर से संसार में गिर जाएगा।
  • केवल वैराग्य: यदि अभ्यास नहीं है, तो व्यक्ति उदासीन और आलसी हो सकता है, लेकिन वह समाधि की गहराई तक नहीं पहुँच पाएगा।

निष्कर्ष

अभ्यास से हम सकारात्मक ऊर्जा पैदा करते हैं और वैराग्य से हम अपनी ऊर्जा का क्षरण (leakage) रोकते हैं। महर्षि पतंजलि ने इन्हें इसलिए महत्वपूर्ण बताया क्योंकि इनके बिना चित्त को पूरी तरह शुद्ध करना और कैवल्य की अवस्था को प्राप्त करना असंभव है।

क्या आप योग सूत्र के किसी अन्य विषय या किसी विशिष्ट सूत्र की व्याख्या समझना चाहते हैं? कृपया कमेंट करें और अपनी जिज्ञासा को चरम तक ले जाएं।