अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: मानवता के लिए एक वरदान
योग केवल
व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला
और विज्ञान है। यह शरीर, मन और आत्मा के
बीच सामंजस्य स्थापित करने का एक प्राचीन भारतीय मार्ग है। आज योग ने अपनी सीमाओं
को पार कर वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना ली है। आइए, इस पोस्ट में प्राचीन वैदिक काल से आधुनिक वैश्वीकरण तक योग के विकास, प्रमुख योगियों और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का संपूर्ण एवं प्रामाणिक विवरण के बारे में जानते हैं।
1. योग की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इतिहास
योग का इतिहास
हजारों साल पुराना है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय ज्ञान और संस्कृति में गहराई से
समाहित हैं:
वैदिक काल में योग :
वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू. से 500 ई.पू.) भारतीय योग परंपरा का आधार स्तंभ माना जाता है। हालांकि इस काल में योग 'पतंजलि योगसूत्र' की तरह एक व्यवस्थित दर्शन के रूप में संहिताबद्ध नहीं था, लेकिन योग के बीज और उसकी मौलिक क्रियाएं वेदों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं।
यहाँ वैदिक काल में योग के स्वरूप पर विस्तृत और प्रामाणिक प्रकाश डाला गया है:
1. 'योग' शब्द की उत्पत्ति और अर्थ
'योग' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की 'युज्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है—जोड़ना, मिलाना या युक्त करना। ऋग्वेद में इसका प्रयोग जुए (yoke) के अर्थ में किया गया है, जो घोड़ों या बैलों को रथ से जोड़ने के काम आता था। आध्यात्मिक अर्थ में, यह इंद्रियों और मन को वश में करके उन्हें परमात्मा से जोड़ने का प्रतीक बना।
2. ऋग्वेद में योग के प्रमाण
ऋग्वेद, जो विश्व का प्राचीनतम ग्रंथ है, उसमें योग का उल्लेख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में मिलता है:
केशी सूक्त (Rigveda 10.136): इसमें 'मुनियों' और 'केशियों' (लंबे बाल रखने वाले) का वर्णन है, जो वायु के समान वेग वाले थे और ध्यान की उच्च अवस्था में रहते थे। यह योगियों के अस्तित्व का सबसे प्राचीन प्रमाण है।
धी (Dhi): ऋग्वेद में 'धी' शब्द का प्रयोग श्रेष्ठ बुद्धि या ध्यान के लिए किया गया है, जो आगे चलकर 'ध्यान' के रूप में विकसित हुआ।
मंत्र: प्रसिद्ध गायत्री मंत्र भी एक प्रकार का 'सगुण योग' ही है, जिसमें सविता (सूर्य) से बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना की गई है।
3. अन्य वेदों में योग का विस्तार
यजुर्वेद: इसमें चित्त की स्थिरता और मानसिक शांति के लिए प्रार्थनाएं मिलती हैं। यजुर्वेद के 5वें अध्याय में मन को स्थिर करने के लिए 'योग' शब्द का प्रयोग हुआ है।
अथर्ववेद: इस वेद में 'प्राण' की महिमा का विस्तार से वर्णन है। 'व्रात्य' सूक्त में उन तपस्वियों का उल्लेख है जो प्राणायाम और विभिन्न शारीरिक मुद्राओं के ज्ञाता थे। यहाँ श्वास पर नियंत्रण (प्राणायाम) के प्रारंभिक सूत्र मिलते हैं।
4. वैदिक योग के प्रमुख तत्व
वैदिक काल में योग मुख्य रूप से कर्मकांड (यज्ञ) और अंतर्मुखी साधना का मिश्रण था:
तप (Tapas): वेदों में 'तप' को बहुत महत्व दिया गया है। इंद्रियों के निग्रह और शरीर को अनुशासित करने की प्रक्रिया को तप कहा गया, जो योग का अनिवार्य हिस्सा है।
स्वाध्याय (Svādhyāya): वेदों का निरंतर पाठ और चिंतन करना 'स्वाध्याय' कहलाता था, जिसे आज भी 'नियम' के अंतर्गत रखा जाता है।
यज्ञ का आध्यात्मिक अर्थ: वैदिक ऋषि यज्ञ को केवल बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि आंतरिक 'योग' मानते थे, जहाँ अहंकार की आहुति दी जाती थी।
प्राण विद्या: सांस लेने की प्रक्रिया को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़कर देखना वैदिक योग की बड़ी उपलब्धि थी।
5. हिरण्यगर्भ: योग के आदि वक्ता
प्राचीन ग्रंथों और स्मृतियों (जैसे अहिर्बुध्न्य संहिता) में उल्लेख मिलता है कि 'हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः' अर्थात हिरण्यगर्भ ही योग के आदि वक्ता हैं। वैदिक ऋषियों ने इन्हीं के माध्यम से योग की सूक्ष्म अनुभूतियाँ प्राप्त की थीं।
महत्वपूर्ण बिंदु: वैदिक काल का योग मुख्य रूप से 'मन्त्र योग' और 'लय योग' के समीप था, जहाँ ध्यान और स्तुति के माध्यम से चेतना को विस्तार दिया जाता था।
निष्कर्ष
वैदिक काल में योग कोई व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति और आत्म-साक्षात्कार का साधन था। उपनिषद काल तक आते-आते यही वैदिक बीज एक विशाल वृक्ष बन गए, जिसका पूर्ण विकास बाद में महर्षि पतंजलि के काल में हुआ।
2.उपनिषद् काल में योग:
उपनिषद् काल (लगभग 800 ई.पू. से 500 ई.पू.) भारतीय योग के इतिहास में 'क्रांतिकारी मोड़' माना जाता है। जहाँ वेदों में योग मुख्य रूप से यज्ञ और मंत्रों से जुड़ा था, वहीं उपनिषदों में यह पूरी तरह से 'अंतर्मुखी साधना' और 'आत्म-साक्षात्कार' का विषय बन गया।
यहाँ उपनिषद काल में योग के स्वरूप और प्रमुख सिद्धांतों का विस्तृत विवरण है:
1. योग की परिभाषा (कठोपनिषद्)
योग की सबसे स्पष्ट और प्रारंभिक परिभाषा कठोपनिषद् में मिलती है। इसमें योग को इंद्रियों पर नियंत्रण के रूप में समझाया गया है:
"जब पाँचों इंद्रियाँ मन के साथ स्थिर हो जाती हैं और बुद्धि भी चेष्टा नहीं करती, उस परम गति को 'योग' कहते हैं।"
2. रथ का रूपक (The Chariot Analogy)
कठोपनिषद् में ही मानव शरीर और योग के संबंध को एक बहुत सुंदर उदाहरण से समझाया गया है, जो आज भी योग दर्शन का आधार है:
आत्मा: रथ का स्वामी।
शरीर: रथ।
बुद्धि: सारथी (Driver)।
मन: लगाम (Reins)।
इंद्रियाँ: घोड़े।
योग का लक्ष्य: बुद्धि रूपी सारथी के माध्यम से मन की लगाम को वश में करना, ताकि इंद्रिय रूपी घोड़े सही मार्ग पर चल सकें।
3. श्वेताश्वतर उपनिषद: क्रियात्मक निर्देश
यह पहला उपनिषद है जहाँ योग की क्रियात्मक विधि और उसके शारीरिक प्रभावों का वर्णन मिलता है:
आसन: शरीर को सीधा रखकर (विशेषकर छाती, गर्दन और सिर को एक सीध में) बैठने का निर्देश।
प्राणायाम: श्वास की गति को नियंत्रित करने और मन को शांत करने की चर्चा।
स्थान: योग के लिए ऐसा स्थान चुनना चाहिए जो समतल हो, शुद्ध हो, कंकड़-पत्थर और अग्नि से मुक्त हो, तथा जहाँ मन को शांति मिले।
सिद्धि के लक्षण: योग साधना में प्रगति होने पर शरीर में हल्कापन, आरोग्य (निरोगता), विषय-तृष्णा का अभाव और स्वर में मधुरता आने लगती है।
4. षडांग योग (Six-fold Path)
पतंजलि के 'अष्टांग योग' (8 अंग) से पहले मैत्रायणी उपनिषद में 'षडांग योग' (योग के छह अंगों) का वर्णन मिलता है:
प्राणायाम: श्वास का नियंत्रण।
प्रत्याहार: इंद्रियों को विषयों से हटाना।
ध्यान: एकाग्रता का निरंतर प्रवाह।
धारणा: चित्त को किसी एक बिंदु पर टिकाना।
तर्क: आध्यात्मिक चिंतन (यह अंग बाद में हट गया)।
समाधि: ध्येय वस्तु में पूरी तरह लीन हो जाना।
5. योग उपनिषद (Yoga Upanishads)
मुख्य 108 उपनिषदों में से लगभग 20 उपनिषद विशेष रूप से योग पर केंद्रित हैं (जैसे—योगतत्त्व, नादबिंदु, वराह उपनिषद आदि)। इनमें कुछ महत्वपूर्ण अवधारणाएं विकसित हुईं:
नाद अनुसंधान: भीतर की ध्वनि (ॐ) पर ध्यान केंद्रित करना।
चक्र और नाड़ियाँ: शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान आदि) और प्राणिक मार्गों (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना) का विस्तृत वर्णन।
कुण्डलिनी: सोई हुई आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करने का विचार इन्हीं ग्रंथों से पुष्ट हुआ।
6. ॐ (ओम्) का ध्यान(माण्डूक्य उपनिषद)
उपनिषदों में 'ॐ' को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। माण्डूक्य उपनिषद में 'ॐ' की मात्राओं (अ, उ, म) के माध्यम से चेतना की चार अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय) का वर्णन है, जो ध्यान की गहराई को दर्शाता है।
निष्कर्ष
उपनिषद काल ने योग को एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विज्ञान का रूप दिया। इसने बताया कि ईश्वर बाहर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर 'हृदय गुहा' में स्थित है, जिसे केवल योग के माध्यम से ही जाना जा सकता है।
3.महर्षि पतंजलि (शास्त्रीय काल) का योग
महर्षि पतंजलि
को 'योग का पितामह' कहा जाता है। उन्होंने बिखरे हुए योग ज्ञान को 'योगसूत्र' के रूप में
संहिताबद्ध किया। पतंजलि का 'अष्टांग योग' (आठ अंगों वाला
योग) वास्तव में मन को अनुशासित करने और मोक्ष प्राप्त करने का एक मनोवैज्ञानिक और
वैज्ञानिक मार्ग है।
यहाँ अष्टांग
योग के आठ अंगों का विस्तृत विवरण है:
1. यम (Yama) - सामाजिक अनुशासन
यम का अर्थ है
वे नैतिक नियम जो हमारे सामाजिक व्यवहार को सुधारते हैं। इसके पाँच प्रकार हैं:
- अहिंसा: मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देना।
- सत्य: विचारों और वाणी में
ईमानदारी।
- अस्तेय: चोरी न करना (दूसरे की
वस्तु या श्रेय की इच्छा न करना)।
- ब्रह्मचर्य: अपनी ऊर्जा का सदुपयोग
करना और इंद्रियों पर संयम।
- अपरिग्रह: अनावश्यक वस्तुओं का
संग्रह न करना।
2. नियम (Niyama) - व्यक्तिगत अनुशासन
नियम हमें
स्वयं के प्रति अनुशासित बनाते हैं:
- शौच: शरीर और मन की शुद्धि।
- संतोष: जो प्राप्त है उसमें
प्रसन्न रहना।
- तप: सुख-दुख में विचलित न
होना और कठिन पुरुषार्थ करना।
- स्वाध्याय: आत्म-चिंतन और पवित्र
ग्रंथों का अध्ययन।
- ईश्वर
प्रणिधान: अपने
कर्मों को ईश्वर या उच्च शक्ति को समर्पित करना।
3. आसन (Asana) - शारीरिक स्थिरता
पतंजलि के अनुसार, "स्थिरसुखमासनम्"—अर्थात जिस स्थिति में आप लंबे समय तक स्थिरता और सुख के साथ बैठ सकें, वही आसन है। इसका मुख्य उद्देश्य ध्यान के लिए शरीर को तैयार करना है।
4. प्राणायाम (Pranayama) - श्वास का नियंत्रण
श्वास और प्रश्वास की गति को नियंत्रित करना प्राणायाम है। यह प्राण ऊर्जा को संतुलित करता है और मन की चंचलता को कम करता है।
5. प्रत्याहार (Pratyahara) - इंद्रिय निग्रह
इंद्रियों (आँख, कान, नाक आदि) को
बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना 'प्रत्याहार' कहलाता है। यह बाहरी दुनिया और आंतरिक दुनिया के बीच का 'सेतु' (Bridge) है।
6. धारणा (Dharana) - एकाग्रता
चित्त (मन) को किसी एक लक्ष्य या बिंदु पर टिका देना धारणा है। जैसे किसी दीपक की लौ या किसी मंत्र पर ध्यान केंद्रित करना।
7. ध्यान (Dhyana) - निरंतर प्रवाह
जब धारणा लंबी और अटूट हो जाती है, तो वह 'ध्यान' बन जाती है। इसमें साधक और ध्येय (जिसका ध्यान किया जा रहा है) के बीच निरंतर संबंध बना रहता है।
8. समाधि (Samadhi) - परम आनंद
यह योग की
अंतिम अवस्था है। यहाँ साधक का अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता है और वह पूरी तरह से
ध्येय में विलीन हो जाता है। यहाँ मन पूरी तरह शांत और आनंदित हो जाता है।
बहिरंग और अंतरंग योग
पतंजलि ने इन
आठों अंगों को दो भागों में बाँटा है:
- बहिरंग
योग: पहले पाँच
अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम,
प्रत्याहार) बाहरी अनुशासन से संबंधित हैं।
- अंतरंग
योग: अंतिम तीन
अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) पूरी तरह मानसिक और आंतरिक हैं।
इन्हें सम्मिलित रूप से 'संयम' कहा जाता है।
एक रोचक तथ्य: पतंजलि योगसूत्र में 'आसनों' (Postures) के नामों (जैसे सूर्य नमस्कार या शीर्षासन) का वर्णन नहीं है; उन्होंने केवल आसन के सिद्धांत पर जोर दिया है।
वैदिक और
उपनिषद काल के दार्शनिक आधार के बाद, मध्यकाल और
आधुनिक काल में योग का स्वरूप काफी व्यावहारिक और वैश्विक हो गया। जहाँ मध्यकाल
में योग 'शरीर साधना' की ओर मुड़ा, वहीं आधुनिक
काल में यह 'जीवनशैली' बन गया।
यहाँ इन दोनों
कालखंडों का सारगर्भित विवेचन प्रस्तुत है:
4. मध्यकाल (Medieval Period): हठयोग और नाथ परंपरा
मध्यकाल (लगभग 500 ई. से 1500 ई.) को 'हठयोग के
उत्कर्ष का काल' माना जाता है। इस दौरान योग केवल ध्यान तक सीमित न रहकर
शरीर की शुद्धि और ऊर्जा के जागरण का विज्ञान बन गया।
- हठयोग का
उदय: महर्षि
पतंजलि का योग मुख्य रूप से मानसिक था, लेकिन मध्यकाल में मत्स्येंद्रनाथ और गुरु गोरखनाथ ने शरीर को माध्यम
बनाकर आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाया।
- प्रमुख
ग्रंथ: इस काल
में तीन अत्यंत प्रामाणिक ग्रंथ लिखे गए:
- हठयोग
प्रदीपिका (स्वामी स्वात्माराम): इसमें आसन, प्राणायाम, मुद्रा और नादानुसंधान का विस्तृत वर्णन है।
- घेरंड
संहिता: इसमें 'सप्तसाधन' (सात अंगों वाला योग) की व्याख्या है, जिसमें 'शटकर्म' (शुद्धि
क्रियाओं) पर विशेष बल दिया गया है।
- शिव
संहिता: इसमें
योग के दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष के साथ-साथ नाड़ियों और प्राण का वर्णन
है।
- साधना का
केंद्र: इस काल
में कुंडलिनी
जागरण, चक्र भेदन और नाद-अनुसंधान (भीतरी ध्वनि सुनना) साधना के मुख्य अंग
बने।
- भक्ति और
सूफी मत का प्रभाव: कबीर, नानक और कई सूफी संतों ने योग की आंतरिक
क्रियाओं (जैसे सहज योग) को अपनी भक्ति परंपरा में शामिल किया।
5. आधुनिक काल (Modern Period): वैश्विक पुनर्जागरण और विज्ञान
19वीं सदी के अंत से लेकर
वर्तमान समय तक का काल योग के 'वैश्वीकरण' का युग है।
(A) योग का
पुनरुद्धार (स्वामी विवेकानंद)
आधुनिक योग की
शुरुआत 1893 के शिकागो विश्व धर्म
सम्मेलन से मानी जाती है, जहाँ स्वामी विवेकानंद ने 'राजयोग' के माध्यम से पश्चिम को योग की बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्ति
से परिचित कराया।
(B) शारीरिक और
चिकित्सात्मक योग (20वीं सदी)
20वीं सदी में योग को
वैज्ञानिक आधार पर पुनर्स्थापित करने का श्रेय टी. कृष्णमाचार्य को जाता है। उनके शिष्यों ने योग को घर-घर पहुँचाया:
- बी.के.एस.
अयंगर (Iyengar Yoga): इन्होंने सूक्ष्म अलाइनमेंट और प्रॉप्स
(जैसे बेल्ट, ईंट) का
उपयोग कर योग को चिकित्सा (Therapy)
के रूप में विकसित किया।
- पट्टाभी
जोइस (Ashtanga Vinyasa): इन्होंने योग को गति और शक्ति के रूप में
प्रस्तुत किया।
- स्वामी
कुवलयानंद: इन्होंने
योग के शारीरिक प्रभावों पर पहला वैज्ञानिक शोध (Scientific Research) शुरू किया।
- मध्यकाल और आधुनिक काल: स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने योग को पश्चिम तक पहुँचाया, और आज यह विश्व स्तर पर स्वीकार्य है।
2. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत
- प्रस्ताव: भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने का
प्रस्ताव रखा था।
- घोषणा: 11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से 177 देशों ने इस प्रस्ताव को बिना किसी मतदान के रिकॉर्ड
समय में स्वीकार कर लिया।
- प्रथम
आयोजन: पहला
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया।
- 21 जून ही क्यों?: यह दिन उत्तरी गोलार्ध में साल का सबसे लंबा दिन होता
है (ग्रीष्म संक्रांति), जिसे
भारतीय परंपरा में आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
3. उद्देश्य (Objective)
योग दिवस मनाने
के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
- विश्व भर
में लोगों को योग के स्वास्थ्य लाभों के प्रति जागरूक करना।
- मानसिक
शांति और शारीरिक फिटनेस के माध्यम से वैश्विक स्वास्थ्य में सुधार करना।
- प्रकृति
और मनुष्य के बीच संतुलन बनाए रखना।
- तनाव और
बीमारियों को दूर कर 'वसुधैव
कुटुंबकम' की भावना को बढ़ावा
देना।
4. भारत में
राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख आयोजन स्थल
प्रतिवर्ष भारत
सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा देश के विभिन्न शहरों में भव्य कार्यक्रम आयोजित
किए जाते हैं:
|
वर्ष |
प्रमुख स्थल (Venue) |
प्रमुख व्यक्तित्व |
|
2015 |
राजपथ (नई दिल्ली) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2016 |
चंडीगढ़ |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2017 |
लखनऊ (उत्तर प्रदेश) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2018 |
देहरादून (उत्तराखंड) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2019 |
रांची (झारखंड) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2020/21 |
डिजिटल माध्यम (कोविड-19 के कारण) |
वर्चुअल संबोधन |
|
2022 |
मैसूर (कर्नाटक) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
|
2023 |
जबलपुर (मध्य प्रदेश) / यूएन मुख्यालय (न्यूयॉर्क) |
उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ / पीएम मोदी |
|
2024 |
श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर) |
पीएम नरेन्द्र मोदी |
5. सामान्य योग
प्रोटोकॉल (Common Yoga
Protocol - CYP)
योग दिवस के
दिन अनुशासन और एकता बनाए रखने के लिए आयुष मंत्रालय ने एक प्रोटोकॉल निर्धारित किया
है। इसमें निर्धारित समय और क्रम में योगाभ्यास किया जाता है:
प्रमुख चरण:
- प्रार्थना: मन को शांत करने के
लिए।
- चालन
क्रियाएं (Loosening
Practices): गर्दन, कंधे, कमर और घुटनों का सूक्ष्म व्यायाम।
- योगासन:
- खड़े
होकर: ताड़ासन, वृक्षासन, पादहस्तासन, अर्ध चक्रासन, त्रिकोणासन।
- बैठकर: भद्रासन, वज्रासन, उष्ट्रासन, शशकासन, वक्रासन।
- पेट के
बल: भुजंगासन, शलभासन, मकरासन।
- पीठ के
बल: सेतुबंधासन, उत्तानपादासन, अर्धहलासन, पवमुक्तआसन, शवासन।
- प्राणायाम: कपालभाति, अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन), शीतली, भ्रामरी।
- ध्यान: मानसिक एकाग्रता के
लिए।
- संकल्प और
शांति पाठ: विश्व
शांति की प्रार्थना के साथ समापन।
6. भारत के प्रमुख
योग संस्थानों की भूमिका
भारत के योग
संस्थानों ने योग को वैज्ञानिक और सुलभ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है:
- मोरारजी
देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान (MDNIY), दिल्ली: यह योग प्रोटोकॉल तैयार करने और प्रशिक्षण देने वाली
मुख्य संस्था है।
- एस-व्यासा
(S-VYASA), बेंगलुरु: योग पर वैज्ञानिक शोध
और उच्च शिक्षा के लिए प्रसिद्ध।
- कैवल्यधाम, लोनावला: प्राचीन योग ग्रंथों
और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर कार्य।
- पतंजलि
योगपीठ, हरिद्वार: स्वामी रामदेव के
नेतृत्व में योग को घर-घर पहुँचाने का श्रेय।
- ईशा
फाउंडेशन और आर्ट ऑफ लिविंग: सद्गुरु और श्री श्री रविशंकर के माध्यम से वैश्विक
स्तर पर मानसिक कल्याण के लिए योग का प्रसार।
निष्कर्ष
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक स्वस्थ जीवनशैली की ओर बढ़ने का संकल्प है। हर साल एक नई थीम (जैसे 'स्वयं और समाज के लिए योग' - 2024) के साथ यह दिवस हमें याद दिलाता है कि योग का अभ्यास हमें शारीरिक व्याधियों से मुक्त कर मानसिक संतोष प्रदान करता है।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न1. अंतरराष्ट्रीय
योग दिवस कब मनाया जाता है?
उत्तर- हर साल 21 जून को दुनिया भर
में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।
प्रश्न2. योग दिवस के
लिए 21 जून की तारीख
ही क्यों चुनी गई?
उत्तर- 21 जून उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में साल का सबसे लंबा दिन होता है, जिसे 'ग्रीष्म संक्रांति' (Summer Solstice) कहते हैं। भारतीय परंपरा में इस समय के बाद सूर्य दक्षिणायन
होता है, जिसे आध्यात्मिक सिद्धियों
और योग अभ्यास के लिए बहुत अनुकूल माना जाता है।
प्रश्न3. इसकी शुरुआत
किसने और कब की थी?
उत्तर- भारत के
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27
सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में अपने भाषण
के दौरान इसका प्रस्ताव रखा था। उनके प्रस्ताव को रिकॉर्ड 177 देशों का समर्थन मिला और 11 दिसंबर 2014 को इसे
आधिकारिक मंजूरी मिली।
प्रश्न4. पहला
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कब मनाया गया था?
उत्तर- पहला योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया था। मुख्य आयोजन नई दिल्ली के राजपथ (अब
कर्तव्य पथ) पर हुआ था, जहाँ दो गिनीज
वर्ल्ड रिकॉर्ड्स बने थे।
प्रश्न5. 'कॉमन योग
प्रोटोकॉल' (CYP) क्या है?
उत्तर-यह आयुष
मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया एक 45 मिनट का
मॉड्यूल है। इसे इसलिए
बनाया गया है ताकि दुनिया भर के लोग, चाहे वे
नौसिखिये हों या विशेषज्ञ, योग दिवस के
दिन एक समान योगाभ्यास कर सकें। इसमें कुछ चुनिंदा आसन, प्राणायाम और ध्यान शामिल हैं।
प्रश्न6. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के प्रतीक चिन्ह (Logo) का क्या अर्थ है?
उत्तर :
- हाथ
जोड़ना: मिलन और
एकता का प्रतीक।
- दो
पत्तियां: प्रकृति
और हरियाली का प्रतीक।
- नीला
घेरा: विश्व
शांति।
- सूर्य: ऊर्जा और चेतना का
स्रोत।
- नीला
पुरुष: स्वास्थ्य
और सद्भाव।
प्रश्न7. क्या योग दिवस
मनाने के लिए किसी विशेष धर्म का होना जरूरी है?
उत्तर- बिल्कुल नहीं।
संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार दोनों ने स्पष्ट किया है कि योग एक 'धर्मनिरपेक्ष' (Secular) अभ्यास है। यह शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक विकास का एक विज्ञान है, जिसे किसी भी धर्म या विश्वास का व्यक्ति अपना सकता है।
प्रश्न8. वर्ष 2026 (12वें योग दिवस) की तैयारी
क्या है?
उत्तर- चूँकि अभी
फरवरी 2026 चल रहा है, आयुष मंत्रालय आमतौर पर मई के अंत या जून की शुरुआत में आधिकारिक थीम की घोषणा करता है। हालांकि, 'योग महोत्सव' जैसे 100 दिनों के काउंटडाउन कार्यक्रम मार्च से शुरू हो जाते हैं।
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