प्राणायाम: जीवन शक्ति के विस्तार और नियंत्रण का विज्ञान
भारतीय योग विज्ञान में प्राणायाम को प्राण ऊर्जा के विस्तार और नियमन का मुख्य आधार माना गया है। 'प्राण' का अर्थ है हमारी जीवन शक्ति और 'आयाम' का अर्थ है उसे नियंत्रित या विस्तारित करना। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग का यह चतुर्थ अंग केवल श्वास लेने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने का सेतु है। नियमित प्राणायाम के अभ्यास से न केवल श्वसन तंत्र (Respiratory System) मजबूत होता है, बल्कि यह रक्त के शुद्धिकरण, मानसिक तनाव की मुक्ति और एकाग्रता बढ़ाने में भी रामबाण सिद्ध होता है। जब हम अपनी श्वास पर नियंत्रण करना सीख जाते हैं, तो हम अपने विचारों और भावनाओं पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं, जो एक निरोगी और ऊर्जस्वित जीवन की पहली सीढ़ी है।
प्राणायाम केवल 'साँस लेने की प्रक्रिया' नहीं है, बल्कि यह वह तकनीक है जो आपके शरीर की 'बैटरी' को ब्रह्मांडीय ऊर्जा से चार्ज करती है।
आइए, इस प्राचीन विज्ञान की गहराई में उतरते हैं।
1. प्राणायाम क्या है? (संजीवनी का विस्तार)
प्राणायाम शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: 'प्राण' (Vital Energy/जीवन शक्ति) और 'आयाम' (Extension/विस्तार)।
महर्षि पतंजलि के अनुसार:
"तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः"
अर्थात्: श्वास और प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोककर उसे एक लय में लाना ही प्राणायाम है।
यह आपके फेफड़ों का व्यायाम मात्र नहीं है, बल्कि आपके सूक्ष्म शरीर की 72,000 नाड़ियों में बहने वाली चेतना का शुद्धिकरण है।
2. प्राणायाम का महत्व और इसे क्यों करें?
क्या आपने कभी गौर किया है? जब आप गुस्से में होते हैं, तो आपकी साँसें तेज हो जाती हैं। जब आप शांत होते हैं, तो साँसें गहरी और लंबी होती हैं। इसका मतलब है कि आपकी साँसें आपके मन का रिमोट कंट्रोल हैं।
लाभ के क्षेत्र | प्रभाव (Impact) |
शारीरिक | रक्त में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ना और कार्बन डाइऑक्साइड का कुशल निष्कासन। |
मानसिक | तनाव वाले हार्मोन (Cortisol) में कमी और एकाग्रता में वृद्धि। |
भावनात्मक | क्रोध, भय और चिंता पर नियंत्रण पाने की अद्भुत क्षमता। |
आध्यात्मिक | ध्यान (Meditation) में उतरने के लिए अनिवार्य आधारशिला। |
3. आज के परिवेश में इसकी उपादेयता (Why Now?)
आज की भागदौड़ भरी 'डिजिटल लाइफ' में प्राणायाम किसी वरदान से कम नहीं है। इसकी प्रासंगिकता के तीन मुख्य कारण हैं:
👉'फाइट या फ्लाइट' मोड से मुक्ति
आज हम हर समय एक अनजाने तनाव में रहते हैं। प्राणायाम हमारे Parasympathetic Nervous System को सक्रिय करता है, जिससे शरीर को संकेत मिलता है कि "सब ठीक है, अब आराम करो।"
👉प्रदूषण और कमजोर फेफड़े
बढ़ते प्रदूषण और सुस्त जीवनशैली के कारण हम अपनी फेफड़ों की क्षमता का केवल 20-30% ही उपयोग कर पाते हैं। प्राणायाम फेफड़ों के 'डेड स्पेस' को कम कर उनकी कार्यक्षमता बढ़ाता है।
👉 डिजिटल डिटॉक्स और एकाग्रता
लगातार स्क्रीन देखने से हमारा 'अटेंशन स्पैन' कम हो गया है। भ्रामरी या अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्धों (Hemispheres) में संतुलन बनाकर मानसिक स्पष्टता लाते हैं।
4.प्राणायाम के बहुआयामी लाभ: एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक विश्लेषण
प्राणायाम का अभ्यास केवल श्वास की कसरत नहीं है, बल्कि यह शरीर की संपूर्ण कार्यप्रणाली को पुनर्जीवित करने वाली एक चिकित्सा है। इसके प्रमुख लाभों को हम तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं:
1. शारीरिक लाभ (Physical Benefits)
- श्वसन तंत्र की मजबूती: प्राणायाम के अभ्यास से फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) बढ़ती है। यह रक्त में ऑक्सीजन के स्तर को सुधारता है और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी अशुद्धियों को बाहर निकालता है।
- हृदय स्वास्थ्य: वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, 'अनुलोम-विलोम' और 'भ्रामरी' जैसे प्राणायाम रक्तचाप (Blood Pressure) को नियंत्रित करने और हृदय गति को सामान्य रखने में सहायक हैं।
- विषहरण (Detoxification): गहरी और नियंत्रित श्वास के माध्यम से शरीर के 70% विषैले तत्व (Toxins) बाहर निकल जाते हैं, जिससे त्वचा में प्राकृतिक चमक आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ती है।
2. मानसिक और तंत्रिका तंत्र के लाभ (Mental & Neurological Benefits)
- तनाव और चिंता में कमी: प्राणायाम 'पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम' (Parasympathetic Nervous System) को सक्रिय करता है, जिससे कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) का स्तर कम होता है और मन शांत रहता है।
- एकाग्रता और स्मरण शक्ति: प्राणायाम मस्तिष्क के दोनों हिस्सों (Left and Right Brain) के बीच संतुलन बनाता है। इससे छात्रों और बौद्धिक कार्य करने वालों की फोकस करने की क्षमता बढ़ती है।
- नींद की गुणवत्ता: 'उज्जायी' और 'भ्रामरी' का नियमित अभ्यास अनिद्रा (Insomnia) की समस्या को जड़ से खत्म करने में कारगर है।
3. आध्यात्मिक और ऊर्जावान लाभ (Spiritual & Energetic Benefits)
- प्राणिक ऊर्जा का संतुलन: हमारे शरीर में 72,000 नाड़ियाँ होती हैं। 'नाड़ी शोधन' जैसे प्राणायाम इन नाड़ियों के अवरोधों को हटाकर ऊर्जा के प्रवाह को सुचारू करते हैं।
- इंद्रिय नियंत्रण: पतंजलि योगसूत्र के अनुसार, "ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्" अर्थात् प्राणायाम से विवेक के प्रकाश पर पड़ा अज्ञान का पर्दा हट जाता है और साधक का अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है।
- चक्रों की जागृति: निरंतर अभ्यास से मूलाधार से लेकर सहस्रार चक्र तक ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन होता है, जिससे साधक उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं का अनुभव कर पाता है।
प्रमाणिकता (Authenticity)
वैज्ञानिक प्रमाण: हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के शोध बताते हैं कि प्राणायाम 'वेगस नर्व' (Vagus Nerve) को उत्तेजित करता है, जो सीधे हमारे मस्तिष्क के शांति केंद्र से जुड़ी होती है। ग्रंथ प्रमाण: हठयोग प्रदीपिका (2/2) में कहा गया है— "चले वाते चलं चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत्" अर्थात् जब श्वास अस्थिर होती है तो मन भी अस्थिर होता है, और श्वास के शांत होने पर मन स्वतः शांत हो जाता है।
योग के सबसे प्रमाणिक ग्रंथ 'महर्षि पतंजलि कृत योगसूत्र' के अनुसार, प्राणायाम के मुख्य रूप से चार प्रकार बताए गए हैं। साधक जब आसन में सिद्धि प्राप्त कर लेता है, तब श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना ही प्राणायाम कहलाता है।
योगसूत्र (साधन पाद, सूत्र 50 और 51) के आधार पर इन 4 प्रकारों का विस्तृत विवरण यहाँ दिया गया है:
5. महर्षि पतंजलि के अनुसार प्राणायाम के 4 प्रकार
पतंजलि योगदर्शन में प्राणायाम को उसकी गति और स्थान के आधार पर वर्गीकृत किया गया है:
1. बाह्य वृत्ति (External Movement)
जब श्वास को पूरी तरह बाहर निकालकर बाहर ही रोक दिया जाता है, तो उसे 'बाह्य वृत्ति' प्राणायाम कहते हैं। इसे आधुनिक भाषा में 'बाह्य कुंभक' भी कहा जाता है।
- विधि: श्वास को वेग के साथ बाहर निकालें और यथाशक्ति बाहर ही रोकें।
- लाभ: यह शरीर के विजातीय तत्वों (Toxins) को बाहर निकालने और मन को स्थिर करने में सहायक है।
2. आभ्यंतर वृत्ति (Internal Movement)
जब श्वास को पूरी तरह अंदर भरकर भीतर ही रोक लिया जाता है, तो उसे 'आभ्यंतर वृत्ति' प्राणायाम कहते हैं। इसे 'आंतरिक कुंभक' के नाम से भी जाना जाता है।
- विधि: गहरी श्वास अंदर भरें और फेफड़ों में रोककर रखें।
- लाभ: इससे फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और शरीर की प्रत्येक कोशिका को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है।
3. स्तम्भ वृत्ति (Suppression/Suspension)
बिना किसी विशेष प्रयत्न के, जहाँ की तहाँ श्वास को अचानक रोक देना 'स्तम्भ वृत्ति' कहलाता है। इसमें न तो श्वास बाहर निकाली जाती है और न ही अंदर ली जाती है।
- विशेषता: जैसे पात्र में रखा जल स्थिर हो जाता है, वैसे ही श्वास की गति को बीच में ही थाम लेना 'स्तम्भ वृत्ति' है।
- लाभ: यह चित्त की चंचलता को तुरंत शांत करने वाला सबसे शक्तिशाली अभ्यास माना गया है।
4. बाह्याभ्यंतर-विषयाक्षेपी (The Fourth Type)
यह प्राणायाम की सबसे उच्च अवस्था है। जब साधक का अभ्यास इतना गहरा हो जाता है कि श्वास न तो बाहर के विषयों पर निर्भर रहती है और न ही अंदर के, वह अपने आप रुकने लगती है, तो इसे 'चतुर्थ प्राणायाम' कहते हैं।
- प्रामाणिकता: योगसूत्र (2.51) में इसे "बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः" कहा गया है।
- अवस्था: यह अवस्था लंबी साधना के बाद स्वतः घटित होती है, जहाँ केवल कुंभक ही शेष रह जाता है।
योग ग्रंथों का प्रमाण (Technical References)
"तस्मिन्सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः" (योगसूत्र 2.49)
अर्थ: आसन सिद्ध होने पर श्वास और प्रश्वास की गति को रोकना ही प्राणायाम है।
प्रकार | तकनीकी नाम | सरल अर्थ |
प्रथम | बाह्य वृत्ति | श्वास को बाहर रोकना (Rechaka-Kumbhaka) |
द्वितीय | आभ्यंतर वृत्ति | श्वास को अंदर रोकना (Puraka-Kumbhaka) |
तृतीय | स्तम्भ वृत्ति | अचानक श्वास रोक देना (Sudden Stop) |
चतुर्थ | विषयाक्षेपी | स्वतः श्वास का रुक जाना (Transcendental) |
प्राणायाम : प्रकृति और प्रभाव के आधार पर प्रकार
प्रभाव (Effect) और प्रकृति (Nature) के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जा सकता है। योग विज्ञान में इनका वर्गीकरण मुख्य रूप से शरीर में ऊर्जा के स्तर (Heating/Cooling) और मानसिक अवस्था के आधार पर किया जाता है।
यहाँ इनका विस्तृत और श्रेणीबद्ध विवरण दिया गया है:
प्राणायामों का वर्गीकरण और संक्षिप्त परिचय
श्रेणी प्राणायाम के नाम मुख्य प्रभाव ऊर्जादायक / उष्णकारी (Vitalizing/Heating)
भस्त्रिका
शरीर में तुरंत ऊर्जा और गर्मी बढ़ाना।
शुद्धिकरण और संतुलन (Purifying/Balancing)
अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन
नाड़ियों की शुद्धि और ऊर्जा का संतुलन।
शांतिदायक / शामक (Tranquilizing/Calming)
भ्रामरी, उज्जायी
मन को शांत करना और तनाव कम करना।
आध्यात्मिक / ध्यानपरक (Meditative)
उद्गीथ
एकाग्रता और उच्च चेतना से जुड़ाव।
ऊर्जादायक / उष्णकारी (Vitalizing/Heating)
भस्त्रिका
शरीर में तुरंत ऊर्जा और गर्मी बढ़ाना।
शुद्धिकरण और संतुलन (Purifying/Balancing)
अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन
नाड़ियों की शुद्धि और ऊर्जा का संतुलन।
शांतिदायक / शामक (Tranquilizing/Calming)
भ्रामरी, उज्जायी
मन को शांत करना और तनाव कम करना।
आध्यात्मिक / ध्यानपरक (Meditative)
उद्गीथ
एकाग्रता और उच्च चेतना से जुड़ाव।
प्रत्येक प्राणायाम का विवरण:
1. भस्त्रिका प्राणायाम (Bellows Breath)
श्रेणी: ऊर्जादायक (Heating)
विवरण: इसमें लोहार की धौंकनी की तरह तेजी से श्वास ली और छोड़ी जाती है। यह शरीर में प्राण ऊर्जा और जठराग्नि को तीव्र करता है।
विशेष: यह कफ दोष को दूर करने और फेफड़ों को शुद्ध करने के लिए सबसे शक्तिशाली है।
श्रेणी: ऊर्जादायक (Heating)
विवरण: इसमें लोहार की धौंकनी की तरह तेजी से श्वास ली और छोड़ी जाती है। यह शरीर में प्राण ऊर्जा और जठराग्नि को तीव्र करता है।
विशेष: यह कफ दोष को दूर करने और फेफड़ों को शुद्ध करने के लिए सबसे शक्तिशाली है।
2. अनुलोम-विलोम (Alternate Nostril Breathing - Basic)
श्रेणी: संतुलनकारी (Balancing)
विवरण: इसमें बाईं नासिका से श्वास लेना और दाईं से छोड़ना, फिर दाईं से लेना और बाईं से छोड़ना शामिल है। इसमें श्वास को रोका (Kumbhaka) नहीं जाता।
विशेष: यह नाड़ी शोधन का प्रारंभिक अभ्यास है जो मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम है।
श्रेणी: संतुलनकारी (Balancing)
विवरण: इसमें बाईं नासिका से श्वास लेना और दाईं से छोड़ना, फिर दाईं से लेना और बाईं से छोड़ना शामिल है। इसमें श्वास को रोका (Kumbhaka) नहीं जाता।
विशेष: यह नाड़ी शोधन का प्रारंभिक अभ्यास है जो मानसिक शांति के लिए सर्वोत्तम है।
3. नाड़ी शोधन (Nadi Shodhan - Advanced)
श्रेणी: शुद्धिकरण (Purifying)
विवरण: यह अनुलोम-विलोम का ही उन्नत रूप है, लेकिन इसमें कुंभक (श्वास रोकना) और बंध (Bands) का प्रयोग किया जाता है।
विशेष: इसका उद्देश्य शरीर की 72,000 नाड़ियों को शुद्ध करना है ताकि ऊर्जा का प्रवाह सुचारू हो सके।
श्रेणी: शुद्धिकरण (Purifying)
विवरण: यह अनुलोम-विलोम का ही उन्नत रूप है, लेकिन इसमें कुंभक (श्वास रोकना) और बंध (Bands) का प्रयोग किया जाता है।
विशेष: इसका उद्देश्य शरीर की 72,000 नाड़ियों को शुद्ध करना है ताकि ऊर्जा का प्रवाह सुचारू हो सके।
4. भ्रामरी प्राणायाम (Humming Bee Breath)
श्रेणी: शामक (Tranquilizing)
विवरण: श्वास छोड़ते समय गले से 'भौंरे' की तरह गुंजन (Humming) की जाती है।
विशेष: यह कंपन मस्तिष्क की नसों को शांत करता है। क्रोध, चिंता और उच्च रक्तचाप (Hypertension) में यह रामबाण है।
श्रेणी: शामक (Tranquilizing)
विवरण: श्वास छोड़ते समय गले से 'भौंरे' की तरह गुंजन (Humming) की जाती है।
विशेष: यह कंपन मस्तिष्क की नसों को शांत करता है। क्रोध, चिंता और उच्च रक्तचाप (Hypertension) में यह रामबाण है।
5. उज्जायी प्राणायाम (Victorious Breath)
श्रेणी: उष्णकारी एवं शामक (Warming & Calming)
विवरण: इसमें गले को थोड़ा संकुचित करके श्वास ली जाती है, जिससे समुद्र की लहरों जैसी धीमी आवाज निकलती है।
विशेष: यह थायराइड ग्रंथियों को सक्रिय करने और खराटे जैसी समस्याओं को दूर करने में सहायक है।
श्रेणी: उष्णकारी एवं शामक (Warming & Calming)
विवरण: इसमें गले को थोड़ा संकुचित करके श्वास ली जाती है, जिससे समुद्र की लहरों जैसी धीमी आवाज निकलती है।
विशेष: यह थायराइड ग्रंथियों को सक्रिय करने और खराटे जैसी समस्याओं को दूर करने में सहायक है।
6. उद्गीथ प्राणायाम (Om Chanting)
श्रेणी: आध्यात्मिक/ध्यानपरक (Spiritual)
विवरण: इसमें गहरी श्वास लेकर 'ओम्' (OM) शब्द का लंबा उच्चारण किया जाता है।
विशेष: यह प्राणायाम और ध्यान के बीच की कड़ी है। यह याददाश्त बढ़ाने और मन को एकाग्र करने के लिए किया जाता है।
श्रेणी: आध्यात्मिक/ध्यानपरक (Spiritual)
विवरण: इसमें गहरी श्वास लेकर 'ओम्' (OM) शब्द का लंबा उच्चारण किया जाता है।
विशेष: यह प्राणायाम और ध्यान के बीच की कड़ी है। यह याददाश्त बढ़ाने और मन को एकाग्र करने के लिए किया जाता है।
काया शुद्धि से आत्म-साक्षात्कार: 'षट्कर्म'
और 'अष्टांग योग'
का अद्भुत
समन्वय
योग केवल
शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति है। जहाँ महर्षि पतंजलि का 'अष्टांग योग'
हमें मानसिक और
आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है, वहीं हठयोग के 'षट्कर्म'
उस यात्रा के
लिए हमारे शरीर को तैयार करते हैं।
1. षट्कर्म: शरीर का शोधन (The Physical Foundation)
हठयोग
प्रदीपिका के अनुसार, अशुद्ध शरीर में उच्च योग का अभ्यास सफल नहीं हो सकता।
षट्कर्म वे छह क्रियाएँ हैं जो शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई करती हैं और वात,
पित्त, कफ (त्रिदोष)
को संतुलित करती हैं:
- नेति: नासिका मार्ग की शुद्धि।
- धौति: आहार नली और आमाशय की सफाई।
- बस्ति: बड़ी आंत का शोधन (Natural Enema)।
- नौलि: पेट की मांसपेशियों और आंतरिक अंगों का व्यायाम।
- कपालभाति: फेफड़ों और मस्तिष्क के अग्र भाग की शुद्धि।
- त्राटक: आंखों की ज्योति और एकाग्रता बढ़ाना।
महत्व: षट्कर्म शरीर से 'विजातीय तत्वों'
(Toxins) को बाहर
निकालते हैं, जिससे शरीर 'अष्टांग योग'
के कठिन
अभ्यासों को सहने के योग्य बनता है।
2. अष्टांग योग: जीवन का क्रमबद्ध विकास (The Spiritual
Ladder)
महर्षि पतंजलि
ने चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए आठ अंगों का मार्ग बताया है:
- यम और नियम: नैतिक और व्यक्तिगत अनुशासन (आधारशिला)।
- आसन: शरीर की स्थिरता और सुखमय स्थिति।
- प्राणायाम: श्वास के माध्यम से प्राण शक्ति का विस्तार।
- प्रत्याहार: इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना।
- धारणा, ध्यान और समाधि: एकाग्रता की पराकाष्ठा और आत्म-साक्षात्कार।
3. षट्कर्म और अष्टांग योग का गहरा संबंध
इन दोनों के
बीच का संबंध 'साधन' और 'साध्य' का है।
- बिना
शुद्धि के प्राणायाम असंभव: यदि नाड़ियाँ मल से
भरी हैं, तो प्राणायाम का लाभ नहीं मिल सकता। षट्कर्म (जैसे
कपालभाति और नेति) नाड़ियों को शुद्ध करते हैं, जिससे अष्टांग योग का
चौथा अंग 'प्राणायाम' सिद्ध होता है।
- स्थिरता
के लिए शोधन: जब शरीर रोगों और
भारीपन से मुक्त होता है (षट्कर्म के माध्यम से), तभी 'आसन'
में लंबे समय तक बैठना संभव हो पाता है।
- एकाग्रता का मार्ग: 'त्राटक' एक षट्कर्म है, लेकिन यह सीधे तौर पर अष्टांग योग के 'धारणा' और 'ध्यान' की नींव रखता है।
निष्कर्ष:
यदि हम अष्टांग योग को एक विशाल भवन मान लें, तो षट्कर्म उसकी नींव को साफ और मजबूत करने वाली प्रक्रिया है। एक साधक जो षट्कर्म के माध्यम से शरीर को शुद्ध करता है, उसके लिए अष्टांग योग के उच्चतम शिखर 'समाधि' तक पहुँचना सरल हो जाता है। अतः, योग के पूर्ण फल के लिए शारीरिक शुद्धि और मानसिक अनुशासन का यह समन्वय अनिवार्य है।
योग और प्राणायाम: महत्वपूर्ण सावधानियाँ (Precaution
Table)
|
अभ्यास का नाम |
किसे नहीं करना चाहिए? (Contraindications) |
विशेष सावधानी (Special Note) |
|
कपालभाति |
गर्भवती महिलाएं, पीरियड्स के दौरान, हर्निया, हाल ही में
हुई पेट की सर्जरी, और उच्च रक्तचाप (High BP) के मरीज। |
हमेशा खाली पेट करें। झटके बहुत तेज न दें। |
|
भस्त्रिका |
हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मिर्गी (Epilepsy), और चक्कर आने की समस्या
होने पर। |
गर्मियों में इसका अभ्यास कम समय के लिए करें क्योंकि यह
शरीर में गर्मी बढ़ाता है। |
|
अनुलोम-विलोम |
यह सबके लिए सुरक्षित है। |
श्वास के साथ जबरदस्ती न करें। गति बहुत धीमी और लयबद्ध
होनी चाहिए। |
|
नाड़ी शोधन (कुंभक के साथ) |
फेफड़ों और हृदय की गंभीर बीमारी वाले लोग श्वास को रोककर
(Kumbhaka) न करें। |
कुंभक का अभ्यास हमेशा किसी अनुभवी गुरु के सानिध्य में
ही शुरू करें। |
|
भ्रामरी |
कान में संक्रमण (Ear Infection) या बहुत अधिक चक्कर आने
की स्थिति में। |
अभ्यास के दौरान कान को बहुत जोर से न दबाएं। |
|
उज्जायी |
गले में गंभीर संक्रमण या हृदय की गंभीर स्थिति में। |
गले में संकुचन उतना ही करें जितना आरामदायक हो, बहुत ज्यादा
तनाव न दें। |
|
षट्कर्म (जैसे कुंजल, धौति) |
अल्सर, गंभीर हर्निया, उच्च रक्तचाप, और हृदय रोगी। |
इन क्रियाओं को कभी भी अकेले न सीखें, विशेषज्ञ का
मार्गदर्शन अनिवार्य है। |
|
शीतली/शीतकारी |
अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, और सर्दी-जुकाम होने पर। |
सर्दियों के मौसम में और ठंडी तासीर वाले लोग इसका अभ्यास
न करें। |
अभ्यास के सामान्य नियम (Common Rules for Blog):
- स्थान: अभ्यास हमेशा हवादार और शांत जगह पर करें।
- समय: प्रात: काल खाली पेट योगाभ्यास के लिए सर्वोत्तम है।
यदि शाम को कर रहे हैं, तो भोजन और योग के बीच कम से कम 3-4 घंटे का
अंतर रखें।
- क्रम: योग का सही क्रम है: षट्कर्म → सूक्ष्म व्यायाम → आसन → प्राणायाम → ध्यान।
- मार्गदर्शन: शुरुआत में किसी योग शिक्षक की देखरेख में ही अभ्यास
करें।
निष्कर्ष: एक छोटी सी शुरुआत
प्राणायाम स्वयं को जानने की यात्रा है। यह आपको 'जीव' से 'शिव' की ओर ले जाने वाला सेतु है। याद रखिए, "जिसने अपनी श्वासों को जीत लिया, उसने अपने मन को जीत लिया।"
"योग और प्राणायाम हमारे पूर्वजों द्वारा दी गई वह अमूल्य धरोहर है, जो बिना किसी खर्च के हमें पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान कर सकती है। चाहे वह षट्कर्म के माध्यम से शरीर की शुद्धि हो या प्राणायाम के माध्यम से प्राणों का विस्तार, प्रत्येक क्रिया हमारे जीवन में संतुलन लाती है। याद रखें, योग केवल एक दिन का अभ्यास नहीं बल्कि एक जीवनशैली है। आज से ही छोटे-छोटे कदम उठाएं, सही विधि को अपनाएं और एक ऊर्जावान भविष्य की ओर बढ़ें।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: प्राणायाम करने का सबसे सही समय क्या है?
उत्तर: प्राणायाम के
लिए सबसे उत्तम समय 'ब्रह्म मुहूर्त'
(सूर्योदय से
पहले) माना जाता है। इस समय वातावरण शुद्ध और शांत होता है। यदि सुबह संभव न हो,
तो शाम को
सूर्यास्त के समय खाली पेट इसका अभ्यास किया जा सकता है।
प्रश्न 2: क्या भोजन के तुरंत बाद प्राणायाम किया जा सकता है?
उत्तर: बिल्कुल नहीं।
प्राणायाम हमेशा खाली पेट करना चाहिए।
भोजन और प्राणायाम के बीच कम से कम 3 से 4 घंटे का अंतर होना
अनिवार्य है, ताकि श्वसन
प्रक्रिया में कोई बाधा न आए।
प्रश्न 3: शुरुआती लोगों (Beginners) के लिए सबसे अच्छा प्राणायाम कौन सा है?
उत्तर: शुरुआती साधकों के लिए अनुलोम-विलोम और भ्रामरी
प्राणायाम सबसे सुरक्षित और प्रभावी हैं। ये मन को शांत
करते हैं और शरीर को कठिन अभ्यासों के लिए तैयार करते हैं।
प्रश्न 4: एक दिन में कितनी देर तक प्राणायाम करना चाहिए?
उत्तर: सामान्य
स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन 15 से 20 मिनट का अभ्यास
पर्याप्त है। प्रत्येक प्राणायाम (जैसे कपालभाति या भस्त्रिका) को 3-5 मिनट से शुरू
करके धीरे-धीरे समय बढ़ाया जा सकता है।
प्रश्न 5: क्या पीरियड्स के दौरान महिलाएं प्राणायाम कर सकती हैं?
उत्तर: हाँ, लेकिन कुछ सावधानियों के
साथ। पीरियड्स के दौरान अनुलोम-विलोम, भ्रामरी और
उद्गीथ जैसे शांत प्राणायाम करना बहुत लाभकारी होता है। हालांकि,
पेट पर दबाव
डालने वाले अभ्यास जैसे कपालभाति या भस्त्रिका से बचना चाहिए।
प्रश्न 6: क्या प्राणायाम से वजन कम हो सकता है?
उत्तर: जी हाँ, कपालभाति और भस्त्रिका जैसे प्राणायाम मेटाबॉलिज्म को तेज करते हैं और शरीर की अतिरिक्त चर्बी को जलाने में मदद करते हैं। नियमित अभ्यास और सही आहार से वजन घटाने में काफी मदद मिलती है।
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